साहित्य चक्र

04 December 2018

4 दिसंबर भारतीय नौसेना दिवस


नौसेना हमारे देश की एक सामुद्रिक अंग है। जिसकी स्थापना 1612 में हुई..। भारतीय नौसेना केवल सामुद्रिक सीमाओं में ही नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की भी ऱक्षक माना जाता है...। हमारे नौसेना विश्व की पांचवी सबसे बड़ी नौसेना है।
जो लगभग 65 हजार भारतीय नौसैनिकों से लैस है..। जो पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी तीन कमांडों में बटी हुई है..। पूर्वी कमांड का हेड ऑफिस विसाखापट्टा, पश्चिमी कंमाड का हेड ऑफिस मुंबई तो दक्षिणी कमांड का हेड ऑफिस कोच्चि में स्थित हैं।  
आपको बता दें पिछले कुछ सालों में हमारी नौसेना लगातार तेजी से आधुनिकीकरण की ओर सफल तरीके से आगे बढ़ रही है...। भारतीय नौसेना की कमान वर्तमान में एडमिरल सुनील लांबा के हाथों में है। भारतीय नौसेना का इतिहास सैकड़ो वर्ष पुराना है...। आजादी से पहले जहां हमारी नौसेना की कई बार नामाकरण और विभाजन हुआ..। जहां शुरु में इसे इंडियन मेरीन के नाम से जाना जाता था, तो वहीं 1685 में इसका नाम बंबई मेरीन रखा गया जो 1830 तक चला..। भारतीय नौसेना का द्वितीय विश्वयुद्ध के समय विस्तार हुआ जहां पहले 2 हजार सैनिक थे उसे बढाकर 30 हजार किया गया..। साथ ही आधुनिक जहाजों की संख्या भी बढ़ाई गई..।स्वतंत्रता के पश्चात हमारी नौसेना नाम मात्र की थी..। विभाजन के वक्त लगभग एक तिहाई नौसेना पाकिस्तान के हिस्से में चली गई..। इतना ही नहीं बल्कि देश के महत्वपूर्ण नौसैनिक संस्थान भी दुश्मनी मुल्क पाकिस्तान के ही हिस्से में आए..। जिसके बाद हमारी सरकार ने नौसेना के विस्तार की तत्काल योजना बनाई...। जिसके बाद सरकार ने नौसेना के लिए हजारों टन क्रूजर खरीदा...। जिसमें राजपूत, राणा, गोदावरी, शामिल है...।
सन् 1964 तक भारतीय नौसेना कई बड़े हथियारों से लैस हो गई..। जिसमें विक्रांत जैसे वायुयानवाहक भी शामिल था...। धीरे-धीरे हमारी सरकारों ने नौसेना सहित देश के तीनों सेनाओं को मजबूत और आधुनिक बनाया..। जिसके परिणाम स्वरूप आज हमारी नौसेना विश्व की पांचवी सबसे बड़ी नौसेना के रूप में विश्वभर में जानी जाती है...। आज हमारी नौसेना के पास आधुनिक हथियारों सहित पनडुब्बियां भारी मात्रा में मौजूद है..।
वैसे आपको बता दूं...। हमारे तीनों सेनाओं का प्रमुख हमारे देश के राष्ट्रपति होता है..। जिसे सुप्रीम कमांडर भी कहा जाता है..। इन्हीं नौसैनिकों इस वजह से हमारे देश की समुद्री सीमा सुरक्षित है..। अन्यथा 26/11 जैसे हमले हर दिन सहने पड़ते...।
नौसेना दिवस के मौके पर देश के सभी नौसैनिकों को हमारे ओर से हार्दिक शुभकामनाएं...। जय हिंद जय भारत..। 

                        संपादनः- दीपक कोहली

01 December 2018

हिंसात्मक अहिंसा

हिंसात्मक अहिंसा

जब - जब क्रान्तिकारियों ने आजादी का बिगुल बजाया था
तब-तब अहिंसा ने उनके मनोबल पर कहर बरपाया था
वतन के नौजवानो पर जुल्म हो तो हिंसा नही थी उन्ही,
नौजवानो से कीड़ा भी मर गया तो असली हिंसा वही थी
हर क्रांतिकारी की फाँसी पर गाँधी का हस्ताक्षर बताइये
क्या ऐसा ही होना चाहिये अहिंसा का सफर
क्रांतिकारी अरमानो की हिंसात्मक अहिंसा थी मोहनदास की.
बदौलत मचल के रह गये थे अरमां तड़पी भारती की आस थी
दिया क्रांतिकारियों का साथ नहीं जय हो अहिंसा के चाकू की है
ये गम की गाथा क्रांतिकारियों की सच्चाई पूजनीय बापू की

हिंसात्मक अहिंसा का प्रकोप इतना ज्यादा था
लगता है आजादी से भी समझौता का इरादा था
हरकतें जिसकी भारती के दामन पर तमाचा हो था
सत्ता का लोभ जिसे कहते क्यों चाचा हो
जिसकी एक गलती सौ अच्छाइयों पर भारी है
जिसकी बदौलत आज तक सीमा पर जंग जारी है

आजादी का उद्घोष हुआ जब देश की जनता सोई थी
सुन वतन के अरमॉ तड़पे, बिखरी बिंदिया रोई थी।
गर ये दो रईस आजादी से न खेले होते शायद
पाक होता न ही कश्मीर के झमेले होते

रचनाकार- बलवन्त बावला

# थल सेना..! देश की सबसे बड़ी ताकत..!

भारतीय थल सेना यानि हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत..। सशस्त्र बल का सबसे बड़ा अंग..। हमारी थल सेना..। हमारी थल सेना देश का वो ताकत है जिससे पूरी दुनिया हिलती है..। 


आइए..! आज हम आपको बताते हैं..। 'थल सेना' की कुछ विशेष तथ्य और जानकारी ...।  

हमारी 'थल सेना' की स्थापना '1 अप्रैल 1895' को हुई..। थल सेना का मुख्यालय 'नई दिल्ली' स्थापित है..। अगर थल सेना के 'आदर्श वाक्य' की बात करें... तो 'सर्विस बिफोर सेवक' यानि 'स्वपूर्ण सेवा' है..। हमारी थल सेना का  'संकेत रंग'- सुनहरा, लाल, काला हैं..। अगर वर्षगांठ की बात करें तो..। प्रति वर्ष '15 जनवरी' को 'सेना दिवस' के रूप में पूरे देश में मनाया जाता हैं...। हमारी थलसेना की वेब साइट  http://indianarmy.nic.in/ है। जिसके माध्यम से आप और अधिक जानकारी ले सकते हैं..और सेना के बारे में आप विस्तार से जान सकते हैं..।  
अगर सेना के 'प्रधान सेनापति' की बात करें..। तो सेना का 'प्रधान सेनापति' देश का 'राष्ट्रपति' होता है..। लेकिन थलसेना की पूरी कमान थलसेनाध्यक्ष के हाथों में होती हैं..। जो 'चार स्टार' 'जरनल' स्तर का अधिकारी होता है..।वहीं थलसेना में सर्वश्रेष्ठ पद 'पांच स्टार' यानि 'फील्ड मार्शल' की रैंक होती है..। जो अब तक के थलसेना इतिहास सिर्फ दो लोग बनें हैं..। 

अगर हम बात करें 'भारतीय सेना' के उद्भव की तो 'ईस्ट इंडिया कंपनी' के रूप में हमारी सेना बनीं थी..। जो बाद में 'ब्रिटिश भारतीय सेना' के रूप में परिवर्तित हुई थी..। स्वतंत्रता के पश्चात इसे 'राष्ट्रीय सेना' के रूप में स्थापित किया...। जो आप विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सेना हैं..। 

हमारी थलसेना का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र की सुरक्षा, देश में शांति और राष्ट्रवाद की एकता को सुनिश्चित करना, तथा बाहरी शक्तियों से राष्ट्र की सुरक्षा करना, देश की सीमाओं में शांति व सुरक्षा प्रदान करना हैं..।  



                                                       रिपोर्ट - दीपक कोहली



# बर्फ की चादर, जवानों की जिंदगी

           


जी हां...! आज मैं उन जवानों की बात करूगां..। जो हमारे लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं..। चाहे दिन हो या रात, हर पल.. वो देश की सेवा में तैनात रहते हैं...। हमारे ये जवान देश के लिए अपनी जान दांव पर लगाए सीमा पर खड़े रहते हैं। चाहे धूप हो या बारिश या फिर बर्फ की चादर ही क्यों ना हो...। हौसले जिनके बुलंद...! मजबूत जिनके कंधे...! सीना जिनका 56 इंच चौड़ा...। वो कोई और नहीं मेरे देश की शान हैं...। मेरे देश के जवान..।  हमारे ये जवान...। ना झुकते है दुश्मन के सामने...! ना डरते है...! ऑंधी-तूफान से....! मैं जय हिंद...! जय हिंद...! से शुरू कर रहा हूं इनकी वीरता की गाथा...।



आइए आप भी जानिए..। हमारे सैनिकों का वीरगाथा...। जय हिंद-जय भारत..। 

हमारे देश की शान..! हमारे सेना के सैनिक-जवान हैं। जो हमारे लिए अपनी जिंदगी मौत के हवाले कर देते हैं। लेकिन आज हमारे देश में इन जवानों को भी सही तरीके का खाना और इनके परिवार वालों को सही सुविधा नहीं मिल पा रही हैं। जिसके चलते हमारे ये जवान आज सोशल साइट पर अपनी आपबीत बताने को मजबूर हो रहे हैं..। जिसके लिए हमारी सरकार ने अभी तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया हैं। वैसे होने को तो हमारी सरकार कई दांवे करती रही हैं। जिसमें वन रैंक-वन पेंशन, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कई मुद्दे शामिल हैं। कई बार तो सरकार और विपक्ष आपस में ही लड़ते रहते हैं। वैसे मैं किसी पार्टी के पक्ष में नहीं बोलना चाहता हूं..! क्योंकि राजनीतिक पार्टियां सब एक जैसी होती हैं। और ना ही मैं इस विषय पर कोई राजनीतिक मुद्दा खड़ा  करना चाहता हूं। बस जवानों पर ही बात करूगां..। हमारे जवान किन हालातों में देश की रक्षा करते हैं। उन कठिनाइयों और मुश्किल पहाड़ों का सामना कैसे करते हैं...? जो खतरनाक ही नहीं जानलेवा भी होते हैं..। क्या आपने कभी आपने सोचा है आखिर कैसे रहते होंगे हमारे ये सेना के जवान...? उस बर्फ की चादर पर कैसे 24 घंटे खड़े रहते होंगे..? जहां हम सोच भी नहीं सकते...कि वहां जीवन जीना कैसा होगा...? आखिरकार अब वो समय आ ही गया है..! कि हर देशवासी को सेना के जवानों के बारे में पता हो..। हमारे जवान किन परिस्थियों में काम करते हैं और अपना समय बीतते हैं..।  

हर देशवासी को जानना होगा...! हमारी सेना कैसे रहती है..?  कैसे सीमा पर पैनी नज़र रखती हैं...? कैसे इसमें शामिल हुआ जा सकता है..?

आइए आपको बताते हैं..। कैसे हमारी सेना की भर्ती प्रक्रिया होती हैं..।  एक आम युवा को पहले भर्ती प्रतिक्रिया पार करनी होती है। उसके बाद उसे नौ महीने कड़ा अभ्यास कराया जाता हैं..। जिसके बाद उसे रंगरूट की ट्रेनिंग दी जाती हैं। जिसके बाद वह युवा उस लायक बनता हैं..। जिसकी जरूरत सेना को होती हैं..। अनुशासन, दया-भाव, नियम आदि सीखाया जाता है। जिसके बाद एक युवा सेना का सच्चा सैनिक बन पता हैं..। देश के लिए मर-मिटने की कसमें खाई जाती हैं..। चाहे घर में मां बीमार हो या फिर पत्नी गर्भ से हो..। अगर देश खतरें में है...! तो हमारे जवानों के लिए सबसे पहले देश यानि भारत माता हैं..।  



                                            * संपादक- दीपक कोहली *   

गीतों का कवि संपूर्ण 'गुलज़ार'...!



'गुलज़ार' यानि 'संपूर्ण सिंह कालरा' जो एक प्रसिद्ध 'गीतकार' और 'पटकथा लेखक' व एक प्रसिद्ध कवि थे...। जिनका जन्म 18 अगस्त 1934 को एक 'सिख' परिवार में  हुआ..। जिनके पिता का नाम 'मक्खन सिंह' तो माता का नाम 'सुजन' था..। वैसे आपको बता दूं...! 'गुलज़ार' का जन्म 'पंजाब' के 'झेलम' जिले के 'दीना' गांव में हुआ था..। जो अब पाकिस्तान में था..। 'गुलज़ार' अपने पिता की दूसरी पत्नी के इकलौते संतान थे..। उनकी माता उन्हें बचपन में ही छोड़ चल बसी थी...। 'गुलज़ार' को ना माँ का आंचल मिला और ना ही पिता का दुलार मिला..। भारत-पाक बंटवारे के समय 'गुलज़ार' का परिवार अमृतसर चला आया और वहीं बस गया...। वहीं 'गुलज़ार' साहब कुछ दिनोंं बाद माया नगरी चले आए..। जहां 'गुलज़ार' साहब ने फिल्म जगत में काम करना शुरू किया..। जिसके बाद 'गुलज़ार' साहब धीरे-धीरे एक महान कवि, गीतकार बनें...। एक बात और आपको बता दूं..। 'गुलज़ार' साहब इससे पहले वर्ली के एक गेरेज में बतौर मेकेनिक के रूप में काम करने लगे..। वहीं खाली समय में कविताएं लिखने लगें..। 'गुलज़ार' साहब ने  आपना पहला गीत 'बिमल राय' की फिल्म 'बंदनी' के लिए लिखा..। 'गुलज़ार' साहब त्रिवेणी छंद के सृजक है..। जो अपने गीतें के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं..। वैसे 'गुलज़ार' की रचनाएं..। हिन्दी, उर्दू, पंजाबी भाषा में ज्यादा पढ़ने को मिलते हैं..। 

अगर हम बात करें..। 'गुलज़ार' को सम्मानित करने की तो इन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका हैं...। सन् 2002 में इन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' तो वहीं साल 2004 में भारत सरकार ने इन्हें देश का तीसरा सर्वोच्च पुरस्कार 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया..। वर्ष 2009 में इन्हें 'डैनी बॉयल' की निर्देशन में बनी फिल्म 'स्लम्डाग मिलियनेयर' में जय हो गीत के लिए 'ऑस्कर पुरस्कार' से सम्मानित किया जा चुका हैं..। वहीं इसी गीत के लिए इन्हें 'ग्रैमी पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका हैं..। वहीं 'गुलज़ार' को 2013 में 'दादा साहेब फाल्के पुरस्कार' भी मिल चुका हैं..। जो 'गुलज़ार' की हकीकत और सामर्थ्य को दर्शाता हैं..।   

आइए एक नज़र इनकी रचनाओं में डालते हैं..। 
चौरस रात, जानम, एक बूंद चांद, रावी पार, खराशें आदि जैसे इनकी कई रचनाएं हैं..। 'गुलज़ार' जी अपनी रचनाओं से सबका दिल जीत लेते हैं..। चाहे वह आज एक युवा हो या फिर 19वीं सदी का एक उम्र दराज आदर्य हो..।   

अगर 'गुलज़ार' साहब के बतौर निर्देशक जीवन की बात करें...तो इन्होंने बतौर निर्देशक अपना सफर 1971 में 'मेरे अपने' फिल्म से शुरू किया..। इससे पहले 'गुलज़ार' साहब ने 'आशीर्वाद, खामोशी' जैसे फिल्मों के लिए पटकथा लिखी थी..। जो फिल्म आज भी लोगों के जुबां पर याद हैं..। 
'गुलज़ार' वो शख्स है जो हिंदी-उर्दू का मिश्रण बखूबी करते हैं..। 'गुलज़ार' अपनी हर  कविता और गीत में उर्दू और हिंदी को एक नया रूप देते हैं..। जो हिंदी-उर्दू भाषा के लिए अमृत जैसा है..।  हम आशा करते हैं..। 'गुलज़ार' अपनी कविताओं और गीतों से हमारा मन हर हमेशा बहलाते रहें..। भगवान उन्हें हर खुशी दें..। उनकी हर मनोकामना पूर्ण हो..। 

                                                           'धन्यवाद' 


                                                                संपादक: दीपक कोहली