साहित्य चक्र

07 May 2023

हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में फर्क

अपने 30 साल के पत्रकारिता करियर में हर पड़ाव पर हिंदी और अंग्रेजी जर्नलिज़्म में बहुत बड़ा फर्क देखा है मैंने। हिंदी वालों को हमेशा ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है लेकिन उसके बावजूद हमेशा इंगलिश वालों से छोटा ही महसूस होता है।





दरअसल जब मैंने एक ट्रेनी के रूप में अपनी पहली नौकरी जॉइन की थी तब मैंने हिंदी और अंग्रेजी जर्नलिज़्म में कोई फर्क नहीं किया। मैं यहां बता दूं कि मेरा जर्नलिज़्म कोर्स हिंदी में नहीं बल्कि इंगलिश मीडियम में था जहां मैंने टॉप किया था। लेकिन जब हिंदी जर्नलिज़्म में नौकरी का अवसर मिला तो सोचा कि मेरी तो हिंदी भी अच्छी है, क्या फर्क पड़ता है। लेकिन फर्क पड़ता है... याद रखें।

अब मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं तो अब खालिस हिंदी वाली कैटेगरी में ही आती हूं। लेकिन इस दौरान बहुत सी बातों को मार्क किया है मैंने जिनको आज यहां साझा करना चाहती हूं।

सबसे पहली बात है सैलरी में बड़ा अंतर। हिंदी पत्रकार और अंग्रेजी पत्रकार की सैलरी में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। ये अंतर सबसे ज्यादा प्रिंट मीडिया में दिखेगा। इसके बाद यह अंतर कम होता जाता है डिजिटल मीडिया और फिर टीवी जर्नलिज़्म में।

टीवी जर्नलिज़्म में चूंकि हिंदी अंग्रेजी से ऊपर है इसलिए वहां यह फर्क ज्यादा नहीं है। टीवी इंडस्ट्री में पहले के जमाने के मुकाबले ओवरऑल सैलरीज़ अब काफी कम हो गई हैं लेकिन फिर भी अब हिंदी और इंगलिश में सैलरीज़ का फर्क शायद (हो सकता है कि मेरी जानकारी सही न हो, अगर ऐसा नहीं है तो मुझे करेक्ट करें प्लीज़) ज्यादा न हो।

दूसरा अंतर है काम का। मुझे लगता है कि अंग्रेजी मीडिया में काम करना हिंदी मीडिया से काफी आसान है। डिजिटल मीडिया के लिए ही नहीं, हर तरह के मीडिया के लिए। चूंकि मैंने प्रिंट में मैगजीन, न्यूज़पेपर से लेकर रेडियो और डिजिटल मीडिया सभी जगह (टीवी को छोड़कर) काम किया है इसलिए यह कह सकती हूं।

यह बात इसलिए सच है क्योंकि हिंदी वालों को अंग्रेजी से अच्छा अनुवाद करना आना जरूरी है। बिना अंग्रेजी जाने हिंदी में किसी पत्रकार को नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है, चाहे वो कितना भी बेहतरीन लेखक हो। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है, वहां सिर्फ इंगलिश का अच्छा ज्ञान होना और बेहतरीन राइटिंग स्किल होना ही काफी है।

हिंदी में कुछ भी लिखना हो, रिसर्च करने के लिए आपको गूगल या आजकल चैट जीपीटी की सहायता लेनी होगी जहां इंगलिश में ही बेहतरीन कॉन्टेंट मिलता है। उसे पढ़कर, समझकर या अनुवाद करके ही इस्तेमाल किया जा सकता है। हुआ ना हिंदी जर्नलिज़्म ज्यादा कठिन और मेहनत वाला काम, जिसे पूरी ईमानदारी और मेहनत से करने के बावजूद आपके हिस्से जो भी आता है वो आपकी मेहनत की पूरी भरपाई नहीं कर सकता।

हिंदी और अंग्रेजी के बीच का ये अंतर हमेशा बहुत खटकता है। क्या आपको भी ऐसा लगता है ?


                                                   - रिचा कुलश्रेष्ठ


चुनाव में मात्र 10 महीने, आखिर कब होगी 'विपक्षी एकता'

आम चुनाव में अब मात्र दस माह बचे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर विपक्षी एकता कब होगी ? विपक्षी पार्टियां जिस तरीके से बिखरी नजर आ रही हैं, उसे देख कर ऐसा लगता है कि ये सभी राजनीतिक पार्टियां एक मंच के नीचे आना ही नहीं चाहती है। आज विपक्ष में खड़ी सभी राजनीतिक पार्टियां सत्ता पक्ष के अत्याचार से प्रताड़ित है। कहीं सीबीआई के छापे पड़ रहे हैं, तो कहीं ईडी का नोटिस मिल रहा है। फिर भी विपक्षी पार्टियां एक साथ खड़ी होने के लिए तैयार नहीं है।




क्या मान लिया जाए विपक्षी पार्टियों ने चुनावी मैदान में कूदने से पहले ही हार मान ली ? अगर ऐसा है तो फिर 2024 के बाद इन पार्टियों का अस्तित्व जिंदा रहेगा! क्योंकि जिस तरीके से बीजेपी बदले की भावना से राजनीतिक कार्रवाई कर रही है, वह साफ बताता है कि 2024 चुनाव जीतने के बाद बीजेपी विपक्ष को पूरी तरह खत्म कर देना चाहती है। 

'ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी' यह मुहावरा बीजेपी की तानाशाही को देखकर विपक्ष के लिए सटीक बैठती है। 2014 से पहले भारतीय मीडिया सत्ता पक्ष से सवाल पूछा करता था, मगर वर्तमान में भारतीय मीडिया सत्तापक्ष के साथ झूला झूल रहा है। इतना ही नहीं बल्कि कभी-कभी तो बिरियानी और आम चूसो पार्टी भी कर लेता है। भारतीय लोकतंत्र में आज विपक्ष एक मुर्दा लाश बन गया है। ना उसके साथ कोई चलने को तैयार है, ना ही कोई उसे जगाने का प्रयास कर रहा है। विपक्षी पार्टियां सिर्फ अपने अस्तित्व को एक दूसरे से लड़कर धीरे-धीरे खत्म कर रही है।

उत्तर से दक्षिण तक समस्त विपक्ष बिखरा हुआ है। विपक्ष के नेताओं का अपनी पार्टी छोड़ सत्ता पक्ष के साथ जाना अब आम बात हो गई है। सत्ता पक्ष ने विपक्ष के हर उस नेता को परेशान किया हैं, जो सत्ता पक्ष के खिलाफ जनता की आवाज़ उठाता है। और तो और अगर कोई पत्रकार या आम नागरिक सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई हो रही है। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी विपक्षी दल एक मंच पर नहीं आ पा रहे हैं। 

जनता महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक मतभेद, सांप्रदायिक हिंसा और कट्टरता से जूझ रही है। सरकार में बैठे फकीर सरकारी संपत्तियों को बेच कर अपने मित्रों को बांट रहे हैं और इन सब मुद्दों पर सारा विपक्ष चुप्पी साधा हुआ है। पिछले 9 सालों में विपक्ष ने जनता के मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ कोई भी बड़ा आन्दोलन नहीं किया है। क्या सच में 2024 आम चुनाव में विपक्षी पार्टियां सत्ता पक्ष के खिलाफ मजबूती से लड़ना चाहती हैं ? विपक्षी पार्टियों की वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि विपक्ष सत्ता पक्ष के सामने खड़ा होना ही नहीं चाहता है। विपक्ष का कोई भी नेता अपने अहंकार और स्वार्थ को छोड़ना ही नहीं चाहता है। बिना स्वार्थ और अंहकार को छोड़े विपक्षी एकता असंभव लगती है। 

अगर सच में विपक्षी पार्टियों को भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करनी है, तो जितनी जल्दी हो सके आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी करनी चाहिए। सभी विपक्षी दलों को एक छतरी के नीचे आकर मजबूती से जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए। तभी देश की आम जनता विपक्षी गठबंधन पर भरोसा कर पाएगी।


                                                         - दीपक कोहली


गर्मी में ये स्टाइलिश आउटफिट्स करें ट्राई, दिखेंगी कूल और स्मार्ट


गर्मी के कहर से बचने के लिए जिससे जितना संभव होता है, बचने की कोशिश करता है। पर धूप से बचने और पसीने की वजह से लोग कई बार फैशन को भी इग्नोर कर देते हैं। पर क्या आप जानती हैं कि गर्मी के सीजन में ड्रेसिंग सेंस का ख्याल रखते हुए भी आप मर्मी से बच सकती हैं और साथ ही कूल और स्मार्ट दिख सकती हैं। सुंदर और स्टाइलिश दिखाई देना हर किसी को अच्छा लगता है। पर गर्मी के सीजन में इसे मेनटेन करना मुश्किल हो जाता है। पर अगर आप यहां दी गई सामान्य टिप्स जान लेंगी तो गर्मी में भी आप स्मार्ट लुक पा सकेंगीं। तो जानिए सिम्पल और काम की स्टाइलिंग टिप्स-




इस प्रकार के कपड़ों को करें पसंद 

गर्मी के सीजन में सूती, खादी और सिफोन के कपड़े पहनना अच्छा रहता है। आप को कम गर्मी लगेगी तो आप को आराम मिलेगा। आप इस समय स्लीवलेस और हाफ स्लीव के कपड़े भी ट्राई कर सकती हैं। परंतु घर से निकलते समय कूल स्लीव के कपड़े पहनें। इससे धूप और लू से राहत मिलेगी।

ये कपड़े न पहनें

गर्मी में सिल्क, नायलोन, वेलवेट जैसे भारी कपड़े पहनने से बचें। इससे आप को गर्मी तो अधिक लगेगी ही, हवा भी शरीर तक नही पहुंच पाएगी। जिसकी वजह से इन्फेक्शन का खतरा हो सकता है।

रंग का ध्यान रखें

गर्मी से बचने के लिए डार्क कलर के खास कर के काला कपड़ा पहनने से बचें। गहरे रंग के कपड़ों में गर्मी अधिक लगती है और पसीना भी अधिक होता है। इसलिए गर्मी में लेमन, लाइट पिंक, पीच, केशरी और आसमानी कपड़ों की पसंदगी उचित रहेगी।

सिर को ढ़कना न भूलें

गर्मी में बाहर जाते समय सिर हमेशा ढ़के रहें। इससे आप को लू लगने का खतरा नहीं रहेगा। ऐसा करने से सिर में दर्द और साथ ही डिहाइड्रेशन भी नहीं होगा। सिर ढ़कने के लिए स्कार्फ या अंगौछे का उपयोग करें। यह आप की स्टाइल को बढ़ाएगा।

हैट और सनग्लास का उपयोग करें

गर्मी में हैट लगाना और गोगल्स पहनना फैशन माना जाता है। परंतु आंख को गर्मी से बचाने का यह उचित तरीका है। गर्मी में सूर्य की हानिकारक किरणों से खुद को बचाने के लिए हैट-कैप और गोगल्स पहनना लाभदायक हो सकता है।


                                                       - स्नेहा सिंह 


हवाई समझौते से बेहतर है जमीनी स्तर पे समझौते हों

सत्ता व सरकार में समान भागीदारी न मिलने की पीड़ा

हवाई समझौते तो नेताओं के बीच में हो जाते हैं पर जमीनी स्तर के समझौते को सता व संगठन मे बैठे लोग नही चाहते कि वोट जो देते हैं उनके बीच में समझौते भी हों । मुख्यमंत्री जी ये कर रहे हैं वो भारी पड़ सकती है पिछले दिनों की बात है जब मुख्यमंत्री बीकानेर के दौरे पर आए थे मुस्लिम समाज ने उनकी मीटिंग का बायकॉट किया था अबकी बार जब मुख्यमंत्री जी बीकानेर आए तो उनके आसपास वही व्यक्तिगत काम वाले लोग जबकि जिन लोगों ने मुख्यमंत्री जी की मीटिंग का बायकॉट किया उन लोगों के बीच मुख्यमंत्री जी ने किसी भी प्रकार से संवाद कायम करने की कोशिश नहीं की न ही अन्य जन प्रतिनिधियों ने उसे उचित समझा उस डैमेज कंट्रोल को हालांकि स्थानीय स्तर पर कुछ मुस्लिम लोगों ने रोजा इफ्तार पार्टी व ईद मिलन के बहाने लोगों को एकत्रित कर डैमेज कंट्रोल का प्रयास किया।


फोटो सोर्स- गूगल



शिक्षा मंत्री जी को वहां भी ऐसा देखने में आया आपस में कानाफूसी करते हुए नजर आए मुख्यमंत्री जी की बात तो दूर की बात है शिक्षा मंत्री जी ने भी मुस्लिमों की नाराजगी को भांप कर आपस में जो भी गिले-शिकवे उन्हें दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया हां ईद मिलन समारोह में जबकि सभी धर्मों के लोग मौजूद थे और केवल अखलियत्त के लिए घोषणाएं करना यह एक अजीब सा लगा जबकि ईद मिलन में सिर्फ सौहार्द की बात होनी चाहिए क्योंकि उस कार्यक्रम में सभी जाति धर्म के लोग आमंत्रित थे।धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने यह कार्यक्रम रखा पर कुछ लोगों द्वारा उन घोषणाओं का पोस्टमार्टम करते हुए घुसर फूसर ये घोषणाएं अमली जामा पहनाने के लिए क्या योजना है ? कहां जमीन है ? इसके लिए क्या करना है ? कहीं घोषणाएं ,घोषणा बन रह जाए, आचार संहिता से पहले हो जाए तो वरना कुछ नहीं । 27 अप्रैल को मुख्यमंत्री का बीकानेर स्टे था।

मुख्यमंत्री जी को भी यह प्रयास करना था स्थानीय राजनेताओं को भी प्रयास करना था कि मुस्लिम वर्ग 95% वोट कांग्रेस को देता रहा है और प्रत्यक्ष रूप से 4 विधानसभा सीटों को प्रभावित करता है जिन्हें 5 साल के दौरान सत्ता व संगठन मैं जो भागीदारी मिलनी चाहिए वह भागीदारी नहीं मिली और उनकी उपेक्षा भी हुई है ये डैमेज कंट्रोल 27 तारीख की जनसुनवाई में हो सकता था पर चंद लोग जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए आए थे वहीं कतारों में नजर आए बाकी बीकानेर के नामी-गिरामी मुस्लिम नेता अन्य जातियों के लोग भी मुख्यमंत्री के जनसुनवाई कार्यक्रम व अन्य कार्यक्रम में नही नजर आये, यहां तक भी देखने में आया कि अबकी किसी भी समाज के लोग समूह में नहीं आए न ही किसी" शेरे " का नारा सुनने में आया 5 मिनट में सुनवाई खत्म।

29 अप्रैल को हवाई समझौते में आपस के नेताओं के बीच समझौते मे मिठाईयां बांटी जाती है ,नेता एक दूसरे को हरा व जिताने में समझौता कर सकते हैं वे पाला भी बदल सकते हैं सिर्फ वोटर पार्टी से बंधा रहे और जो वोट देने वाला तबका है उसकी उपेक्षा होती हो यह कहां का न्याय है मुख्यमंत्री जी ।

मुख्यमंत्री जी ने दो दर्जन से ज्यादा कल्याण बोर्ड और फाउंडेशन बनाए हैं जैसे भी मुस्लिम बोर्ड के लोग मांग करते हैं तो ठंडे बस्ते मांग, क्या नाई, दर्जी, धोबी, मोची आदि का काम मुस्लिम नही करते कोई मेंबर नही बनाया।और कोई स्थान नहीं दिया ।किसी मुस्लिम बोर्ड के गठन की घोषणा अब तक क्यों नही हुई ?

सभी जाति धर्म के लोगों ने महापंचायते कि उन्होंने अपनी ताकत दिखाइ यहां तक की mla अधिक टिकट व आरक्षण की मागे की, मुख्यमंत्री बन सके नारे लगाए जो 5 % वोट नहीं देता है उनको कल्याण बोर्ड से नवाजा गया यह मुख्यमंत्री जी किस तुष्टीकरण की ओर बढ़ रहे हैं आम लोगों में यह धारणा है मुस्लिमों को कांग्रेस ने अपनी जेब का लड्डू समझकर लोग इस्तेमाल करते हैं कि यह कहां जाएंगे वह तो हमे ही वोट देंगे साडे 4 वर्ष के इस दौरान मुस्लिम दिल्ली जयपुर के चक्कर निकाल निकाल कर थक गए स्थानीय विधायकों ने भी मुस्लिमों के वही काम जो मुस्लिमों के लिए जायज हो मुस्लिम सराय के लिए जमीन नहीं मुस्लिम आबादी क्षेत्र खाजूवाला छतरगढ़ पुगल बीकानेर जहां यारु खान पड़िहार, अजीम खान शाहू , फते खान नायच आदि अनेक जो उस जमाने से अपनी साख रखते थे उनके लिए क्या किया ? क्या इनके नाम पर मुस्लिम हॉस्टल मुस्लिम समुदाय भवन कि कहीं भी जमीन आवंटित की ।इनकी पॉलिसी सिर्फ अल्पसंख्यक रूपी आइसक्रीम ,आइसक्रीम देते रहे जिसमें मुस्लिमों का भला क्या हुवा ?

अब कांग्रेस ने भी और कुछ मुस्लिम लोगों ने भी मुस्लिमों में फूट डालो और राज करो की नीति अपनानी शुरू कर दी है मुसलमान किसी जाति ,पार्टी विरोधी, व्यक्ति विरोधी नहीं है उनको अपने हक के लिए आवाज उठाने के लिए अभी विवश किया जा रहा है और जिस के स्थानीय विधायकों ने व मुख्यमंत्री जी ने भी मुस्लिमों की उपेक्षा की है क्या मुख्यमंत्री जी के इंटेलिजेंस कमजोर है जो इस वोट बैंक के बारे में मुख्यमंत्री को पहुंचाने में नाकामयाब रही है मेरा मानना है कि छोटी मोटी समस्याएं हैं , मुख्यमंत्री जी के osd बीकानेर आते हैं स्वागत कराते हैं क्या वे मुस्लिमो से फीड बैक लेते हैं उनकी समस्याओं का निवारण भी करते हैं क्या ?

छोटे-मोटे ट्रांसफर के लिए महीनों चक्कर निकालने पड़ते हैं जबकि विपक्षी दलों के लोगों के ट्रांसफर 2 दिन में हो जाते हैं आम बात है आम मुसलमान शांत हैं क्या सड़क नाली या किसी सामुदायिक भवन में कुछ घोषणाएं कर देना क्या पर्याप्त है ? ये घोषणाएं तो हर जाति के लिए होती है यह तो सरकारी काम है इसके अलावा कितने काम हुए हैं 51 वर्ष से वीर चक्र शहीद की उपेक्षा हो रही है जबकि कल परसों ही मुख्यमंत्री जी ने शहीदों के नाम से मूर्ति अनावरण के कार्यक्रम किए हैं क्या यह सोतेलापन नहीं है वीर शहीद रफीक खान के नाम से आज तक स्कूल नहीं बनी है जिसको शिक्षा विभाग ऑब्जेक्शन पर ऑब्जेक्शन लगाकर उसको क्या दर्शाता है ? क्या मुस्लिम राजनेता व स्थानीय स्तर के तीनों मंत्रियों ने भी मुस्लिमों के व्यक्तिगत काम के अलावा कोई सार्वजनिक मुस्लिम हित का प्रकरण हल करने में रुचि दिखाई ?

मोहम्मद उस्मान आरिफ महबूब अली के नाम से कोई चौराहा बाग बगीचा समुदायिक भवन ,कॉलेज का नामकरण बना जबकि कई समुदायों के लोगों के एमएलए के नाम से चौराहे कॉलोनी बन चुके हैं यह भी तो भेदभाव है इसमें भी समानता होनी चाहिए क्यों नहीं बने अभी भी कई नेताओं के नाम से मांगे उठ रही है कौमी एकता का मरकज है बीकानेर लेकिन राजनीति के लोगों की सोच मुसलमान सिर्फ वोटर हैं इक्के दुक्के लोगों पे हाथ रख मुसलमानों को रिझाया नहीं जा सकता हर क्षेत्र में भागीदारी सुनिश्चित हो। मुसलमान भाईचारा आपसी सौहार्द में विश्वास रखते हैं परंतु राजनीति में ठगा महसूस करते हैं,अब यदि मुसलमान सता व संगठन मे भागीदारी की बात करता है तो ठेंगा ! सभी पार्टियों का चरित्र एक सा ही है।

मुसलमान का वोट तो ले लेंगे पर मुसलमान को कोई वोट नही देता नहीं, ऐसा क्यों ? तो फिर मुसलमान अपना वोट क्यों दे अपने वोट को सोच समझ कर दे। भाजपा भी मुस्लिम को एक टिकट देकर मुस्लिम कार्ड खेल सकती है अबकी बार ओबीसी एस सी में भी असंतोष है जब रंधावा जी अशोक जी ने पूर्व विधानसभा के लिए जिताऊ उम्मीदवार पूछा तो स्थानीय मंत्रियों ने किसी जाति विशेष का नाम लेने से भी लोगों में रोष व्याप्त है। अब मुस्लिम भी अपने राजनैतिक अस्तित्व व हक की बात के लिए उचित निर्णय लेने के मूड में नजर आ रहा है, वर्तमान घटनाओं से कुछ ऐसा नजर आता है।

                                                                           - नाचीज़ बीकानेरी 


01 May 2023

अपने अंतर्ज्ञान का पालन करें।

अंतर्ज्ञान यह समझाने में सक्षम हुए बिना कुछ "जानना" है कि आप तर्कसंगत रूप से उस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे। यह वह रहस्यमय "आंत भावना" या "वृत्ति" है जो अक्सर पूर्वव्यापी में सही हो जाती है। जब आप अपने विकल्पों को कम कर देते हैं और एक चौराहे पर फंस जाते हैं, तो अपने अंतर्ज्ञान के संपर्क में रहने से मदद मिल सकती है। आप अपने अंतर्ज्ञान को विकसित करने के लिए व्यायाम करके अपने सहज ज्ञान युक्त उपहारों को सर्वश्रेष्ठ बना सकते हैं, यह जानकर कि किस प्रकार की परिस्थितियाँ सहज निर्णयों को बुलाती हैं, और यह जानने के लिए कि आपका अंतर्ज्ञान कैसा महसूस करता है और कार्य करता है।





अपनी भावनाओं के बारे में लिखें। अपनी भावनाओं के संपर्क में रहने और अपने सहज पक्ष को अनलॉक करने के लिए एक डायरी रखना एक शानदार तरीका हो सकता है। आप जो कुछ भी महसूस कर रहे हैं या जिसके बारे में सोच रहे हैं उसे लिखें, तर्कसंगतता या अपनी आंतरिक आवाज के बारे में चिंता किए बिना। चेतना लेखन की धारा, या आपके दिमाग में आने वाले पहले शब्द या विचार को केवल लिख देना, आपके अवचेतन मन में क्या चल रहा है, इसके बारे में अधिक जागरूक होने में आपकी मदद कर सकता है।

ध्यान आपके शरीर द्वारा आपको भेजे जा रहे सहज ज्ञान युक्त संकेतों के साथ अधिक तालमेल बिठाने में आपकी मदद कर सकता है। अपनी शारीरिक स्थिति के बारे में अधिक जागरूक बनने में मदद करने के लिए कुछ बुनियादी ध्यान तकनीकों का प्रयास करें। ध्यान करने के लिए एक शांत और आरामदायक जगह खोजें जहाँ आप परेशान या विचलित न हों। एक आरामदायक स्थिति में बैठें, अपनी आँखें बंद करें और अपनी श्वास की संवेदनाओं पर ध्यान केंद्रित करें। यदि आपका मन भटकता है, तो धीरे से अपना ध्यान अपनी श्वास पर केंद्रित करें।

"बॉडी स्कैन" करने का प्रयास करें। लेट जाओ, अपनी आँखें बंद करो, और मानसिक रूप से अपने शरीर के प्रत्येक भाग पर बारी-बारी से ध्यान केंद्रित करो, पैर की उंगलियों से शुरू होकर अपने सिर के ऊपर तक जाओ। अपने शरीर के प्रत्येक भाग में होने वाली किसी भी संवेदना से अवगत रहें और किसी भी तनावग्रस्त मांसपेशियों को आराम करने के लिए सचेत प्रयास करें। जब आप कर लें, तो कुछ मिनट के लिए अपने पूरे शरीर पर ध्यान दें। अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कुछ मिनट निकालें।

खुद को विचलित करें। हालांकि यह अतार्किक लग सकता है, व्याकुलता वास्तव में आपको निर्णय लेने में मदद कर सकती है। आपका मस्तिष्क अवचेतन स्तर पर जानकारी को संसाधित करता है, भले ही आप उस पर सक्रिय रूप से ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हों या उसके बारे में सोच रहे हों। यदि आपको निर्णय लेने में कठिनाई हो रही है, तो कुछ समय के लिए कुछ और करें। फिर समस्या पर लौटें, और उस निर्णय के साथ चलें जो "सही" लगता है।

नींद हमारे शरीर और दिमाग को आराम देने और मरम्मत करने के लिए महत्वपूर्ण है, और यह उन सूचनाओं को संसाधित करने में भी मदद करती है जो हम दिन के दौरान लेते हैं। अगर आपको निर्णय लेने में परेशानी हो रही है, तो इसे एक तरफ रखकर कुछ नींद लेने की कोशिश करें। जब आप जागते हैं, तो आप पा सकते हैं कि आपके अंतर्ज्ञान ने आपको निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया है।

अपने ज्ञान और सामान्य ज्ञान का प्रयोग करें। यदि आप एक अपरिचित स्थिति में हैं, एक जटिल समस्या को हल करने की कोशिश कर रहे हैं, या एक महत्वपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता है, तो कुछ शोध करें या अपनी आंत को संभालने से पहले सलाह लें। यदि आप व्यावहारिक ज्ञान, उचित अपेक्षाओं और अपने विकल्पों की समझ के साथ इसका उपयोग करते हैं तो आपका अंतर्ज्ञान आपके लिए बेहतर काम करेगा।

परिचित स्थितियों में अपने अंतर्ज्ञान को सुनें। पैटर्न पहचानने में हमारा दिमाग बहुत अच्छा है। यह हमें जल्दी और बिना ज्यादा सोचे-समझे निर्णय लेने की अनुमति देता है। साइकिल चलाते या चलाते समय आपने शायद इस प्रकार के अंतर्ज्ञान का उपयोग किया होगा। एक बार जब आप किसी चीज़ का कुछ बार अभ्यास कर लेते हैं (जैसे भाषण देना, संगीत का प्रदर्शन करना, या कोई खेल खेलना), तो जाने देने की कोशिश करें और अपने नोट्स का हवाला देने, घड़ी को देखने, या सोचने के बजाय अपने अंतर्ज्ञान को हावी होने दें। हर कदम।

अपने स्वास्थ्य के बारे में अपनी प्रवृत्ति को सुनें। आप अपने शरीर को किसी और से बेहतर जानते हैं। अगर आपको लगता है कि कुछ गलत है, भले ही वह सूक्ष्म हो या आप उसे स्पष्ट रूप से समझा नहीं सकते, तो चिकित्सीय सलाह या ध्यान दें। यदि आपको अभी भी लगता है कि चिकित्सा पेशेवर को देखने के बाद भी आपकी चिंताओं का समाधान नहीं किया गया है, तो दूसरी राय लें। हो सकता है कि आपको कुछ ऐसा समझ आ रहा हो जो आपके डॉक्टर को नहीं है।

आप अपने करीबी लोगों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के बारे में एक मजबूत अंतर्ज्ञान भी विकसित कर सकते हैं। यदि आप किसी बच्चे के माता-पिता या अभिभावक हैं, या यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रहते हैं जिसे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हैं, तो उनकी स्थिति के बारे में अपने सहज ज्ञान युक्त संकेतों पर ध्यान दें। आपको यह आभास हो सकता है कि कुछ गलत है, भले ही वे इसे आपके ध्यान में न लाएँ या स्वयं इस पर ध्यान न दें।

अपने प्रमाणन को बड़े दस्तावेज़ में आपकी मदद करें। यदि आपके सामने कोई बड़ी खरीदारी करने, किस कॉलेज में जाने का निर्णय लेने या शादी करने जैसे बड़े विकल्प हैं, तो तर्क और व्यावहारिक विचार महत्वपूर्ण हैं। लेकिन एक बार जब आप सभी पेशेवर और संबंध के वजन को स्वीकार कर लेते हैं और अपने विकल्पों को कम कर देते हैं, तो आप अपनी पसंद से सबसे अधिक संतुष्टि प्राप्त करने की संभावना रखते हैं यदि आप निर्णय को अंतिम निर्णय लेने के लिए मार्गदर्शन करते हैं।

अपनी आंत सुनो। यह सिर्फ एक रूपक नहीं है - हम वास्तव में अपनी कुछ "सोच" अपनी हिम्मत से करते हैं। पेट में दर्द, आपके पेट में तितलियों की अनुभूति, या बुरी खबर सुनने पर आपको मिलने वाली विशिष्ट डूबती हुई भावना से आपका "आंत मस्तिष्क" आपको यह बता सकता है कि आप तनावग्रस्त हैं या आपके दिमाग से पहले उत्साहित हैं। यदि आपका पेट दर्द करता है या असहज महसूस करता है जब आप किसी विशेष स्थिति या लोगों के साथ काम कर रहे होते हैं या उसके बारे में सोचते हैं, तो यह आपका शरीर आपको बता सकता है कि वे आपके लिए तनाव का स्रोत हैं। इन संकेतों से अवगत रहें, और यदि संभव हो तो ब्रेक लें या ट्रिगर करने वाली स्थिति या व्यक्ति से बचें।

अपनी नाक का पालन करें। आप हमेशा इसके बारे में जागरूक नहीं हो सकते हैं, लेकिन आपकी सूंघने की क्षमता एक शक्तिशाली उत्तरजीविता उपकरण हो सकती है। आपकी नाक आपको बता सकती है कि क्या कुछ खाने के लिए असुरक्षित है, और किसी अन्य व्यक्ति की भावनात्मक या शारीरिक स्थिति का मूल्यांकन करने में भी आपकी मदद कर सकती है। नियमित रूप से व्यायाम करके और सिगरेट के धुएं की तरह गंध की भावना को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदूषकों से बचकर अपनी गंध की भावना को बढ़ावा दें।

अपनी आंखों का प्रयोग करें। जब आप किसी अपरिचित स्थिति में प्रवेश करते हैं, तो चारों ओर एक त्वरित नज़र डालें। यहां तक कि अगर आप जो कुछ भी देख रहे हैं उसके बारे में जागरूक नहीं हैं, तो भी आपकी आंखें महत्वपूर्ण दृश्य संकेतों पर उठा सकती हैं जो सहज प्रतिक्रियाओं में योगदान दे सकती हैं। उदाहरण के लिए, आप अवचेतन रूप से किसी अन्य व्यक्ति के चेहरे के भाव या शरीर की भाषा में तत्काल स्पष्ट होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को उठा सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति या स्थिति के बारे में कुछ गलत या खतरनाक लगता है, तो ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि आपकी आँखों ने कुछ ऐसा देखा है जो आपके दिमाग में नहीं था।

हमारे शरीर में पाँच इंद्रियाँ हैं: स्पर्श, गंध, स्वाद, दृष्टि, श्रवण। लेकिन अनदेखी नहीं की जानी चाहिए हमारी आत्मा की इंद्रियां: अंतर्ज्ञान, शांति, दूरदर्शिता, विश्वास, सहानुभूति। लोगों के बीच अंतर इन इंद्रियों के उनके उपयोग में निहित है; अधिकांश लोग आंतरिक इंद्रियों के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं जबकि कुछ लोग उन पर भरोसा करते हैं जैसे वे अपनी भौतिक इंद्रियों पर भरोसा करते हैं, और वास्तव में शायद इससे भी ज्यादा।


                                                                                   - डॉ. माध्वी बोरसे