साहित्य चक्र

17 October 2022

कविताः भावनाओं को व्यक्त



क्यों होते हैं हम स्वयं के साथ सख्त,
चलो करें, अपनी भावनाओं को व्यक्त,
चिकित्सक भी होता है कभी बीमार,
उसको भी जरूरत पड़ता है एक चिकित्सक

हां हम सभी को है हक,
तो किस बात का है मन में शक,
एक बालक की तरह कर दे सब बयां,
स्वयं पर और अपनों पर भी भरोसा रख

चल स्वयं को हृदय से परख,
जन्नत सी जिंदगी को क्यों बनाए नरक,
समझदारी में अपनी मासूमियत कहीं ना खोदे,
ना रहे, स्वयं के अंदर कोई कसक

क्यों होते हैं हम स्वयं के साथ सख्त,
चलो करें, अपनी भावनाओं को व्यक्त,
चिकित्सक भी होता है कभी बीमार,
उसको भी जरूरत पड़ता है एक चिकित्सक

लेखक- डॉ. माध्वी बोरसे


लेखः विश्व का हर सातवां व्यक्ति हर दिन भूखा सोता है।


एक तरफ भूखमरी तो दूसरी ओर महंगी दावतों और धनाढ्य वर्ग की विलासिताओं के अम्बार, बड़ी-बड़ी दावतों में जूठन की बहुतायत मानवीयता पर एक बदनुमा दाग है। इस तरह व्यर्थ होने वाले भोजन पर अंकुश लगाया जाए, विज्ञापन कंपनियों को भी दिशा निर्देश दिए जाएं, होटलों और शैक्षिक संस्थानों, दफ्तरों, कैंटिनों, बैठकों, शादी और अन्य समारोहों और अन्य संस्थाओं में खाना बेकार न किया जाए। इस भोजन का हम अपने समाज की बदहाली, भूखमरी और कुपोषण से छुटकारे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सरकार के भरोसे ही नहीं, बल्कि जन-जागृति के माध्यम से ऐसा माहौल बनाना चाहिए।





भारतीय संस्कृति पूरे विश्व के लिए मिसाल है। यहां सदियों से अन्न को ब्रह्म माना जाता रहा है। मगर आज आधुनिकता के दौर में लोग इतने अंधे होते जा हैं कि अन्न को पूजने के बजाय थाली में भोजन छोड़ना एक फैशन मानने लगे हैं। शायद इन लोगों को भोजन के अभाव में भूखे मरने वालों की जानकारी नहीं है। भोजन की बर्बादी से न केवल सरकार, बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। दुनिया भर में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है, उसका एक तिहाई यानी लगभग एक अरब तीस करोड़ टन बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों के खाने की जरूरत पूरी हो सकती है।

"व्यक्तिगत हित के लिए न करें ऐसा कोई काम,
कि अन्न की कमी हो जाये और भूखा रहे इंसान।"

भोजन, आहार या खाद्य पदार्थ इसको हम चाहें कितने भी अलग-अलग नामों से पुकार लें,इससे इसकी हमारे जीवन में अहमियत जरा भी कम नहीं होती, क्योंकि भोजन और आहार से ही हमें अपने दैनिक जीवन के कार्यों को करने की शक्ति,ऊर्जा मिलती है। आपको बता दें कि पूरी दुनिया में लोग एक साल में लगभग 1.3 बिलियन टन के बराबर भोजन को बर्बाद कर देते हैं, जो दुनिया में पैदा होने वाले कुल खाद्य पादर्थों का एक तिहाई आंकड़े के बराबर होता है। जहां एक तरफ दुनिया में भुखमरी धीरे धीरे अपना विकराल रूप ले रही हैं। वहीं दूसरी तरफ भोजन की बर्बादी का इतने बड़े स्तर पर होना एक भयानक समस्या बनती जा रही है। भोजन की अत्याधिक बर्बादी जलवायु परिवर्तन में भी एक अहम भूमिका निभा रही है,क्योंकि बर्बाद भोजन को जब धरती पर बिखेरा जाता है तो उससे मीथेन गैस बनती है।

अगर आप भी खाने या भोजन की बर्बादी करते हैं तो आपको बता दें कि आप अपनी मेहनत से कमाए गए करोड़ों रूपयों को खुद ही अपनी लापरवाही से बर्बाद कर देते हैं। हम आज आपको कुछ आसान कुछ छोटे छोटे उपाय बता रहे हैं जिससे आप भोजन की बर्बादी के साथ-साथ अपनी मेहनत की कमाई को कुछ हद तक बचाया जा सकता हैं।

भोजन की बर्बादी रोकने के उपाय

1. समझदारी से खरीदें :-
जब भी आप खाने की चीजों की खरीददारी करने जाएं, तो कोशिश करे कि वही चीजें खरीदें जो लंबे समय तक ताजी रह सकें। इससे आप बेवजह की फिजूलखर्ची से भी बच जाएगें।

2. खाद्य पदार्थों को सही से रख सके:-
भोजन की सबसे ज्यादा बर्बादी उसका सही से भंडारण न करने से होती है। आलू, टमाटर,खीरा, प्याज, लहसुन आदि खाद्य पदार्थों को कभी भी ठंडा न करें, इन्हें हमेशा खुली और सूखी जगह पर ही रखें।

3. एक्सपायरी डेट को जरूर देखें :-
आजकल लोग समय की कमी वजह से लोग डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों को खरीद लेते हैं जो कुछ समय के ही बाद खराब हो जाते हैं। ऐसे में हमेशा कोशिश करें कि जब भी आप डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ खरीदें, तो सबसे पहले उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देख लें। इससे आप जहां खराब खाना खाने और बीमार होने से बच जायेगें, साथ ही आप अपने पैसों और भोजन को बर्बाद होने से रोक पायेगें।
4. समय समय पर फ्रिज की करें सफाई :-
आमतौर पर सबको फ्रेश और हेल्दी फूड देखने और खाने में सबसे पहले पसंद आता है, लेकिन अगर वो ही फल और सब्जियां थोड़ा सा भी बदरंग हो जाती है,तो वो घरेलू कचरा बन जाती है। ऐसे में अगर आप भोजन की बर्बादी को रोकना चाहती हैं,तो समय समय पर फ्रिज की सफाई करती रहें।
क्योंकि इससे आपके फ्रिज में सड़ा और पुराना भोजन ज्यादा दिन तक नहीं रहेगा। इससे जहां आप अपने फ्रिज को साफ और हाईजिनिक रख पायेगीं, वहीं पुराना और बासी खाना खाने से होने वाली बीमारियों से खुद को बचा पायेगीं।

5. घर में बनाएं कंपोस्ट खाद:-
अगर आपके घर में भी भोजन बर्बाद होता है तो आप उसे कचरे में न फेंक कर एक बड़े प्लासिट्क कंटेनर में स्टोर कर, घर में ही खुद कंपोस्ट खाद बनाएं और अपने बगीचे में उस खाद का प्रयोग करें। इससे आप जहां घरेलू कचरे को फैलाने से बच सकेगें, साथ ही घर के गार्डन के लिए कुछ ही प्रयास में होममेड कंपोस्ट खाद बना सकेगें।

6 .प्लेट में जरूरत से ज्यादा न परोसें:-
खाना खाते वक्त हमेशा प्लेट में उतना ही खाना परोंसे, जितना आप खा सकें। कभी भी प्लेट में भूख से ज्यादा खाना नहीं परोसना चाहिए।

विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व का हर सातवां व्यक्ति हर दिन भूखा सोता है। भारत में यह आंकड़ा हर पांचवें व्यक्ति पर स्थिर है। अगर इस अन्न बर्बादी को रोका जा सके तो बहुत सारे लोगों का पेट भरा जा सकता है। समाज के साथ साथ सरकार को ‘भोजन बचाओ भूखों को खिलाओ जैसे अन्य जागरूकता अभियान के तहत भोजन के प्रति लोगों को जागरूक करते रहने की जरूरत है, ताकि आने वाले समय में देश को किसी बड़े भुखमरी जैसे आपदा का सामना न करना पड़े। खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में ‘निज पर शासन, फिर अनुशासन’ एवं ‘संयम ही जीवन है’ जैसे उद्घोष को जीवनशैली से जोड़ना होगा।

समाज में फिजुलखर्ची, वैभव प्रदर्शन एवं दिखावे की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने एवं भोजन केेे आइटमों को सीमित करने के लिये आन्दोलन चल रहे हैं, जिनका भोजन की बर्बादी को रोकने में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। सरकार को भी शादियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार करना चाहिए। दिखावा, प्रदर्शन और फिजूलखर्च पर प्रतिबंध लगाना चाहिए,लेकिन यह सख्ती से लागू नहीं होता, जिसे सख्ती से लागू करने की जरूरत है। स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

लेखिका- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


शीर्षक: भ्रष्टाचार और भारत का भविष्य



आचरण यदि नापाक़ हो, अशुद्ध और अस्वीकार्य हो ,तो वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आने लगता है। भ्रष्टाचार ,जैसा कि शब्द से ही इसका अर्थ समझ आ रहा है ,अर्थात जब हमारे व्यवहार में सच्चाई न रहे और हम झूठ ,पाखंड और दंभ का सहारा लेकर जीवन में कुछ हासिल करने की होड़ में शामिल हो जाते हैं, तो यह आचरण भ्रष्ट आचरण कहलाता है। भ्रष्टाचार किसी क्षेत्र विशेष में ही हो ,यह आवश्यक नहीं ।विभिन्न क्षेत्रों में अक्सर भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं और भ्रष्टाचार साबित हो जाने के बाद भ्रष्टाचारियों को कानूनन सजा और पेनल्टी का प्रावधान भी भारतीय न्याय व्यवस्था में रखा गया है। 





किंतु, इतने सब प्रावधान के होने के बावजूद भी देश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और खूब फल-फूल रहा है, पोषित हो रहा है। महंगाई की ही तरह भ्रष्टाचार भी एक संक्रामक बीमारी की भांति फैलता जा रहा है और देश की जड़ों को खोखला कर रहा है।

*उफ्फ ये बढ़ती महंगाई* 
*हाय जानलेवा ये भ्रष्टाचार*
*शरीर और दिमाग दोनों को*
*बना रहे ये कितना बीमार*

शिक्षा के क्षेत्र की यदि बात करें ,तो शिक्षण संस्थानों में दाखिले से लेकर परीक्षा परिणाम तक में भ्रष्टाचार व्याप्त है ,जहां भ्रष्टाचारी पैसे की ताकत के सामने झुकता है और अपने सभी नैतिक मूल्यों को भुला देता है। राजनीति के क्षेत्र में हमारे राजनेता देश को बेचने पर आमादा हैं।वे सभी अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति करने हेतु किसी भी हद तक गिर सकते हैं क्योंकि उन्हें देश और समाज से कोई सरोकार नहीं होता। राजनीति में आने के बाद वे अपना और अपनों का घर भरने लगते हैं, और समाज व देशहित की उपेक्षा करने लगते हैं,जिसका दुष्प्रभाव अर्थव्यवस्था के गिरने के रूप में दृष्टिगत होता है। इस संदर्भ में मेरी ये पंक्तियां सार्थक प्रतीत होती हैं:


*सबको बस अपने घर भरने हैं*
*जीजा साले सब फिट करने हैं*
*स्वार्थ को इन्होंने चढ़ा आकाश में*
*अर्थव्यवस्था कर दी पूरी बेकार*


निसंदेह, भ्रष्टाचार स्लो पोइज़निंग की भांति देश की तरक्की के आड़े आ रहा है और अपना विष घोल कर देश की प्रगति में सीलन लगाने का काम कर रहा है ।भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी अधिक फैल गई हैं कि वर्तमान में देश का हर दूसरा व्यक्ति चाहे वह किसी भी तबके से संबंध रखता हो ,किसी भी कार्य को करने से पहले उसके दिमाग में अच्छाई की जगह भ्रष्टाचारी होने की तरकीबें आने लगती हैं और वह कम समय में अधिक मुनाफा कमाने की रणनीतियां बनाने लगता है,फिर चाहे इस प्रक्रिया में देश और समाज का नुकसान ही क्यों ना होता हो।   


देश में भ्रष्टाचार यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो कहीं ऐसा ना हो कि हमारा देश विकासशील देशों से अल्प विकसित देशों की श्रेणी में आ जाए। यदि समय रहते भ्रष्टाचार पर सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं एवं जन कल्याणकारी संस्थाओं द्वारा लगाम नहीं कसी गई ,तो वह दिन दूर नहीं जब भारत, जिसे सदियों से सोने की चिड़िया और विश्व गुरु के नाम से पहचाना जा रहा है ,जाना जा रहा है, वही भारत बहुत जल्द विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्र के रूप में गिना जाने लगेगा।


अपने देश को विकसित, स्वस्थ,समर्थ तथा सशक्त राष्ट्र बनाने में हम सभी भारतीयों को निज संकीर्ण मानसिकता का त्याग करना होगा ,स्वार्थी और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचना होगा,भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा करना होगा और सर्व कल्याण और विश्व बंधुत्व की भावना को तरजीह देते हुए अपने सार्थक प्रयास करने होंगे तथा भारत को प्रगति की राह पर ले जाने में अपना शत प्रतिशत योगदान देना होगा।


                                                                लेखिका- पिंकी सिंघल


कविताः बुराई हटाओ





रास्ते में पड़ा पत्थर
राहगीर के ठोकर
लगने से पहले
उठा कर हटाओ।

मवाद पड़े फोड़े को
ज्यादा फैले उससे पहले 
ऑपरेशन कर 
हटाओ।

गर रहबर
बेखबर हो तो 
ऐसे रहबर को भी
मिल कर हटाओ।

राह में 
कांटे हों तो
उन काँटों को
देखते ही हटाओ।

दोस्तों , देश में
जो लोग भी
नफरत फैलाने वाले हों
उन्हें जड़ से हटाओ।

कोई भी बुराई
कहीं भी हो
उस बुराई को ,पनपने से पहले 
मिल कर हटाओ।

दो बुराइयां हैं 
इन बुराइयों में 
जो ज्यादा खराब हो
उसे पहले हटाओ।

आओ, अपने-अपने
गिरेबां में झाँको 
तन-मन की
बुराई को भी हटाओ।


मईनुदीन कोहरी

कविताः मृत्युभोज


मृत्यभोज बहिष्कार का 
निमंत्रण मिला,
उसमें लिखा था कि 
आइये आप मृतक को 
सच्ची श्रद्धांजलि दीजिये, 
कार्ड में विचार पेश करने के लिये 
बड़े समाजसेवी का नाम छपा था! 
वैसे आज के समय में पढ़े-लिखे लोग 
मृत्यभोज जैसे कार्यक्रम से कतरा रहे हैं! 
फिलहाल कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गया
श्रद्धांजलि का कार्यक्रम कम और 
राजनीति भाषण वाले विचार ज्यादा चल रहा था! 
भोजन के फिजूल खर्च और कुरीतियों 
पर जमकर वार किया जा रहा था.
खुशी हुआ चलो अच्छा 
मृत्यभोज जैसा कुप्रथा बंद हो
अच्छा होगा! 
कार्यक्रम जैसे समाप्त हुआ, 
तभी मृतक का भतीजा मेरे पास आकर बोला
"सर आप बिना नाश्ता किये मत जाना
पीछे टेंट में नाश्ता की व्यवस्था हैं.
देखा मृत्यभोज बहिष्कार वाले 
लोग पेट दबाकर नाश्ता कर रहे थे!

                                      लेखक- अभिषेक राज शर्मा