साहित्य चक्र

17 August 2019

क्या क्या करू मैं अर्पित

कैसे करूं मै शम्भो 
                      आराधना तुम्हारी 
क्या क्या करू मैं अर्पित 
                   योगी हो तुम कामारी 

 

स्नान करूं समर्पित 
                गंगा जटा निवासी 
आसन करूं समर्पित 
                कैलाश के तुम वाशी 
वस्त्रों में क्या दूं तुमको 
               दिगम्बर आकाशधारी 

कैसे करूं मै शम्भो 
                     आराधना तुम्हारी 

माला करूं जो अर्पण 
                  तू     भुजंगमाल्यधारी 
चंदन कहाँ लगाऊँ 
                  भस्मोद्धूलित  विग्रहारी 
मधु  कैसे  चढाऊँ 
                      मधुकर ही पहरेदारी 

कैसे करूं मै शम्भो 
                  आराधना तुम्हारी 

भस्म क्या लगाऊँ 
                   शम्शान का तू वाशी 
ध्यान कहाँ धरूं मै 
                   कैलाश हो या काशी
नैवेद्य करूं निवेदित
                    पत्तों के तुम आहारी 
कृपा करो कृपानिधी 
                    तुम ही हो सर्वाधारी 

कैसे करूं मैं शम्भो 
                    आराधना तुम्हारी 
क्या क्या करूं मै अर्पित 
                 योगी हो तुम कामारी 


                                    सेवाजीत अभेद्य

07 August 2019

कल तक जो मेरे दीवाने थे

*बेवफा यूँ हो जाएंगे*




  संग जिनके 
  हंँसते गाते
  कुछ जाने/पहचाने 
  आज हुए वो 
  बेगाने से
  कल तक जो मेरे दीवाने थे।


  वफा को वो 
  क्या जाने !
  जो ख़ुद से अनजाने 
  हुए अजनबी हैं 
  वो जो हर पल 
  साथ निभाते थे।


  बदल गई राहें
  उनकी जो 
  कदम से कदम 
  मिलाते 
  कसमें वादे 
  झूठे सारे 
  सच्चे उनके बहाने थे।


  बाँहों में मेरी
  गुजारी रातें
  मिले यूँ जैसे!
  न पहचाने 
  याद आते हैं 
  गीत पुराने
  जो कभी प्रेम तराने थे।


  बेवफा
  यूँ हो जाएँगे
  यह न जाने!!
  इंतजार 
  करते रहे बहोत
  वो लौटकर न आए
  और न आने थे।


                                      डॉ. रचनासिंह"रश्मि"


04 August 2019

राजनीति के गलियारों

दूषित राजनीति 
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राजनीति के गलियारों में 
सांपों ने डाला डेरा 
विष-विष हो गया भारत प्यारा 
झूठ, दिखावा, कोरी हेकड़ी भर-भर 
फुला रहे हैं सीना 
बहुत मुश्किल हुआ संविधान का जीना
भारत माँ का आँचल तक गिरवी रख आये 
और विकास का गाते हैं गाना 
भारत के नेताओं को शैतान ने गुरु माना
चोरी, लूट, हत्या, बलात्कार स्वयं करते 
कानून को कठपुतली सा नचाते 
हाथी वाले दांत सबसे छुपाते 
भारत भू का करके सौदा 
राष्ट्रधर्म की लगाते टोपी 
संसद में बैठे मान्यता प्राप्त पापी 
गिरगिट सा पल-पल रंग बदलते हैं 
स्विंस बैंक काली कमाई से भरते हैं 
ये तनिक नहीं काल से डरते हैं 
जातिधर्म की लगाके आग 
स्वार्थ की रोटियां सेकते हैं 
चोर-चोर मौसेरे भाई बनकर रहते हैं 
सुभाष, भगत, बिस्मिल के कफनों की लगाके बोली 
आजादी का पाठ पढ़ाते हैं 
भारत के नेता झूठ, मक्कारी, बेईमानी का खाते हैं 
आज दूषित हुई राजनीति 
इसे स्वच्छ बनाना है 
जनता को जागरुक होना है ।


                            - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 


मेरी व्याकुल निगाहें



थोड़ा सा दिन 
बचा कर रखा है 
तुम्हारे लिए....
आओगे न तुम?
खुले किवाडो़ को तकती
मेरी व्याकुल निगाहें
आतुर हैं
वो पदचाप सुनने के लिए
सुनकर जिसे 
मेरा,मायूस मन
 खिल जाएगा
कब से तरस रही हूँ 
तुम्हारी आंखों में
अपनी तस्वीर देखने को
जब तुम आओगे
प्रेम हमारे दरमियाँ होगा
दोंनों की धड़कने
एक सुर में धड़केंगी
आ जाओ न...तुम
गुजर न जाए ये वक्त कहीं ...
सूना लम्हा प्रेम पिपासे 
नयनों से कुछ तो
मोहलत माँगेगा और
इंतजार तड़पकर
अधूरे ख्वाबों का फिर 
मोल माँगेगा
एकटक जोहती बाट तुम्हारी
 मैं सिसक पड़ूँगी
बचा खुचा दिन आँचल में 
कब तक समेटूँगी 
बोलो अब 
क्या इन आँखों का
इंतजार तन्हा ही लौटेगा ?


                                            निधि मुकेश मानवी


महकती रूह

दोस्ती इसी से ज़िन्दगी आसां
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रिश्ता ये है अनमोल ,
बेशुमार प्यार देता है ।
महकती रूह जिससे है,
ये वो संसार देता है ।

मौज मस्ती की 
है साकार परिभाषा
ज़िन्दगी इसमें है,
इसी से ज़िन्दगी आसां ।

:यादों के खजाने हैं
नादानी बचपन सी
कविता है ये मीठी
लिए अपनापन सी ।

धड़कन में छिपी बातें
तो दोस्त जान लेता है ।
महकती रूह है जिससे
ये वो संसार देता है ।

कच्ची इमली  सी 
कहीं रंगीन कंचे सी
गुड़िया के वालों सी
है मीठे सवालों सी

गंगा सी है पावन 
ऊंची है अम्बर सी ।
चंदा सा तन उजला
गहरी समन्दर सी ।

मुस्कान के आँसू 
भी पहचान लेता है ।
महकती रूह जिससे है
ये वो संसार देता है ।

                              रागिनी स्वर्णकार