साहित्य चक्र

04 August 2019

ज्वाला लिए कंठ में...!

"लोभ धर्म के विरुद्ध हैं, सत्य धर्मं का अनुयायी हैं
वासना विषय नहीं हैं, जाति शब्द धर्म के विरुद्ध हैं।

वाणिज्य भी अशुद्ध हैं, कृपाण भी अशुद्ध हैं
चोट खाये सिंह सा, प्रबुद्ध वर्ग में प्रतिशोध हैं।

प्रचण्ड वायु सा बुलाता,ज्वाला लिए कंठ में 
हर असहाय के अभिमान को, ठोकर लगाता हैं।

अनीति धवजाधारियों को ,युद्ध में बुलाता हैं
मग्न सा हंसता हुआ ,अशात्ति व्यूह बनाता हैं।

भरता हुॅ॑कार वह भी, आग सा लगाता हैं
शौर्यं की शिखा को  , शूल सा चुभाता हैं।

जन्म तो अधिकार हैं, हीन भावना एक अपराध हैं
देश में फैली अनेकों असहिष्णुता जाति ,धर्म पर अभिशाप हैं।

यथार्थ के तट पर , भीषण अशांति हैं अब
इसलिए सहते हर मौन में,अब सहिष्णुता को जगाना हैं।

ईश के आशीष को , कर्म से देश में अब फैलाना हैं
श्रृंखला धर्म– सत्य की,प्रेम से देश में लाना हैं ।।"


                                                रश्मि त्रिपाठी

    

मन की आँख से है अंधा


दान पेटी तो भर जाती हैं लेकिन 
मन्दिर के महँतो का चड़ावे से पेट नही भरता।
चड़े भगवान की मुर्ति पर नोटों की माला।
इन्हें क्या मन्दिर के बाहर एक ढांचे में 
भगवान का ही रुप जो भूखे पेट है मरता
मन्दिर की आड़ में चला रहे हैं धंधा 
अब कोई किस किस को समझाए
जब हर दूसरा तन की आँख को खोलकर
मन की आँख से है अंधा 
करना ही दान अगर
तो क्ंही रोटी बैंक तो क्ंही
दिन हीन सहायतार्थ
कोई दिव्यांग वैन चालवाओ
दिखे जो तुमको नग्न अवस्था में 
तो उसको वस्त्र पहनाकर उसका तन
ढक जाओ भरी पड़ी है दुनिया
अनाथ अपाहिज बेसहारो से
मन्दिर तो लगते मन्दिर कम 
जमते हैं चाँदी सोने से लड़कर
जैसे महल हो राजवाड़ौ से जाग बंधु
अब और न बड़ा तू मन्दिर का चंदा
हाथ बड़ा उस हाथ को अपना
जिसको जरुरत है तेरी
जिससे न होना पड़े तुझे उस
परमात्मा के आगे शर्मिंदा
छोड़ो दान पेटी में पैसा डालना
जो देता जगत को उसको कोई क्या देगा
कर भला किसी दरिद्र का
वो पालनहार तुझको प्रसन्न होकर
अपने आलिंगन में भर लेगा।
लालच अब और तुम न इनका बड़ाओ 
जो पात्र लगे दान योग्य
उसके लिये कुछ कर जाओ।

                                                          स्वीटी गोस्वामी भार्गव


03 August 2019

आओ मिलकर पाठ पढ़े

'आओ मेरे पास'



प्यारे बच्चों,प्यारे बच्चों आओ मेरे पास,
दूर वहाँ क्यो बैठो हो तुम हो क्यो इतने उदास?

आओ मिलकर पाठ पढ़े कुछ सीखे नयी बात,
मिल जुलकर हम साथ रहे और मन में हो विश्वास।

प्यारे बच्चों,प्यारे बच्चों आओ मेरे पास,
दूर वहाँ क्यो बैठो हो तुम हो क्यो इतने उदास?

सुबह उठो जल्दी से तुम और बोलो सबको शुभ प्रभात,
बस्ता लेकर स्कूल चलो तुम सब ले हाथों मे हाथ।

प्यारे बच्चों,प्यारे बच्चों आओ मेरे पास,
दूर वहाँ क्यो बैठो हो तुम हो क्यो इतने उदास?

नित्य कर ईश्वर की प्रार्थना कर्त्तव्य  मार्ग पर डटे रहो,
कोई भी कठिनाई आये पर तुम पीछे न कभी हटो।

प्यारे बच्चों,प्यारे बच्चों आओ मेरे पास,
दूर वहाँ क्यो बैठो हो तुम हो क्यो इतने उदास?

पढ़ लिखकर रोज ही सीखो अच्छी-अच्छी बात,
जीवन मे खूब आगे बढ़ो तुम सच्चाई के साथ।

प्यारे बच्चों,प्यारे बच्चों आओ मेरे पास,
दूर वहाँ क्यो बैठो हो तुम हो क्यो इतने उदास?

                                            अभिषेक शुक्ला 'सीतापुर'


भूख से तड़पता

★    गरीबी   ★

गरीब हूँ मैं एक गरीब
इसका मुझको अफ्सोस नही ।
अफ्सोस मुझे इस बात का
मुझको समझते लोग नही ।।



भूख से मैं तड़पता हूँ
बस पानी से पेट भरता हूँ ।
बाहर निकल कर घर से मैं
मेहनत मजदूरी करता हूँ ।।

जहाँ भी मैं चला जाता हूँ
मन मे खिन्न ले आता हूँ ।
कोई नही है मेरे करीब
सब जगह दुत्कारा जाता हूँ ।।

बच्चे भूख से तड़प रहे है
खाना नही उनके नसीबी में ।
मिल जाये कोई जादू की छड़ी
अब जिंदगी कट रही गरीबी में ।।

आगे तीतर ना पीछे तीतर
कचरे में ही मेरा बिस्तर ।
गरीबी ही मेरा जीवन है
नही है कोई मेरा स्तर ।।

आना कभी इस गरीब की
कोठी पे दिल दिखाऊंगा ।
तीतर बितर देखोगे फिर भी
दिल पर अपने बिठाऊंगा ।।

ऐसा क्या गुनाह किया मैंने
गरीबी में पैदा होकर ।
इंसान को ही नही समझे
तुम खुद ही इंसान होकर ।।

                                     ✍️  रोशन पैकरा 'मयारू'


झूले डल गए....

*लो आया सावन झूम के*
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झूले डल गए बागों में
लो आया सावन झूम के
हाथों में लेकर हाथ
आओ झूलें गायें हम
रिमझिम रिमझिम बूंदे आई

फिर से शोर मचाएं हम
जी करता है आसमां को
मुट्ठी में कैद कर लाएं
स्वच्छन्द उड़ें गगन में
सावन की खुशियां पाएं

हरियाली की चादर ओढ़े
धरती ने श्रृंगार किया
सजी धजी महकी क्यारी
मन को लगती प्यारी
सावन में कावड़िया बोले

बम बम भोले बम बम भोले
चले झुण्ड के झुंड 
कतार में चले जा रहे
महादेव के भक्त प्यारे
शिव जी खुश होंगे

बरसेगी काली बदली
ठंडी ठंडी चली बयारें
लगता सावन लाई रे
स्वागत अभिनंदन श्रावण
तुम आये बहार लाये

सब दिल से बोलें
लो आया सावन झूम के

                               कवि राजेश पुरोहित