साहित्य चक्र

24 March 2019

मनमीत......



मीत मेरा......ना जाने कहाँ खो गया?
ढ़ूंढती हैं  मेरी निगाहें  उसे यहाँ-वहाँ!
सुकूं लूटके दिल का जाने कहाँ गया?
दिल हमारा  दुखाया  करूं क्या बयाँ?
साथ उसके खुशी से  जीए जा रहे थे,
वो न रहा जिंदगी में लुटा है मेरा जहाँ!
संग उसके दुख भी, सुख ही  लगते थे,
अब सुख भी लगे  दुख करें क्या बयाँ!
बिछड़के उससे, जीवन में अँधेरा हुआ,
सच है उसी से ही था रौशन मेरा जहाँ!
उसकी  कमी से  अधूरा है  सुंदर जहाँ,
उससे ही तो था   मुकम्मल  मेरा जहाँ!
ढ़ूंढ कर  कोई ला  दो मेरे  मनमीत को,
बिना उसके जीना नही  गँवारा है यहाँ!

                                     मंजू श्रीवास्तव



दर्द

# आज फिर दर्द खरीदने चली हूंँ मैं #

बरसों दर्द की गली में पली हूं मैं
आज फिर दर्द खरीदने चली हूंँ मैं।
दर्द के समंदर में डूबकर निकली हूँ मैं
जो ना करना था खूब कर निकली हूँ मैं
तौहमते लगा कर अपने ही जहां में ,
मेहर ओ मा खोकर हुजूर निकली हूं मैं।

‌ जानती नहीं वरना क्यों कर गुजरती ,
अनजाने में ही अपना खूं कर निकली हूं मैं ।
अश्क रूकता नहीं याद जाती नहीं ,
अश्क और यादों के समुंदर में डूब कर निकली हूँ मैं।

रो सकती नहीं हँस लेती हूँ गम में ,
चीख अपने जिगर में रोक कर निकली हूं मैं।
यही गम रहेगा जीवन में साथ मेरे ,
अपनों को सफर में छोड़ कर निकली हूँ मैं।

मतलब की दुनिया के दस्तूर से " रश्मि"
हाय देखों आज कितनी भली हूं मैं।
भोली - भाली देख दुनियादारी अक्सर,
अजब-सादिक तेरे ही रंग में ढली हूँ मैं।

रोशन करने को गैर का आशियाना,
मरमरी- समा बनकर हरदम जली हूँ मैं।
हमदर्दी देख जमाने की अक्सर मुरझाई ,
सालता - दर्द देख फूली-फली हूँ मैं।

बरसों दर्द की गली में पली हूं मैं ,
आज फिर दर्द खरीदने चली हूँ मैं ।।
* मेहर ओ मा ( चांद, सूरज)

                                          रश्मि अग्निहोत्री

वीर सपूतों की कुर्बानी

देश पर हमला करने वाले कभी खुश नही रह पायेंगे।
आतंकियों पे पलटवार कर उन्हें नानी याद दिलाएंगे।


वीर सपूतों की कुर्बानी पर आँखें हुई है सबकी नम,
आक्रोश फैला हुआ जहाँ में उन गीदड़ों का रक्त बहाएंगे।

चालीस वीर सपूतों का बलिदान व्यर्थ नही जाने देंगे,
पाकिस्तानी आतंकवादी अपने किये पे बहुत पछताएंगे।


बहुत हो गया बेरहमीपन, बहुत हो गया कायरपन,
अब न रहम करेंगे तुमपर तुम्हें जरूर सबक सिखाएंगे।

उठो भारतीय आँसू पोछो अपना रौद्र रूप दिखाना है,
खून ख़ौल रहा अब सबका आतंकियों को मार गिराएंगे।


चुन-चुन कर बदला लेना है पाकिस्तानी नरपिशाचों से,
धर चंडी-काली का रूप भारत का रौद्र रूप दिखाएंगे।

फिर से जन्म लेगी दुर्गे माँ उन दुष्टों का संहार करने को,
उन राक्षसों का संहार कर देश के शहीदों का कर्ज चुकाएंगे।


                          सुमन अग्रवाल "सागरिका"


।।आह्वान।।





आह्वान है यह हमारा
सभी धर्मों के अनुयायियों से
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
बौद्ध जैन सभी भाईयों से
कि सब मिलकर एकता से
अनोखी सी एक रीत चला दो
बलात्कार के आरोपी को
चौराहे पर जिंदा जला दो
यह नारी के जज्बातों को
खंडित करती तलवार है
यह नारी के तन-मन पर
एक घिनौना अत्याचार है
इस अनोखे रीत को जब 
अपनाएगा पूरा देश
तब बलात्कारियों के तबके में
जाएगा एक उचित संदेश
कि नारी कोई खिलौना नहीं
वह बहन बेटी और माता है
नारी अब अबला नहीं
पुरूषों की भाग्यविधाता है
अब जाति धर्म के नाम पर
समाज को नहीं बांटना है
बस नारी पर जो हाथ उठे
उस हाथ को काटना है
क्योंकि हम यह जान चुके  हैं 
उनके कुकर्म देखकर
कि वो  इज्जतें नहीं लूटते
जाति धर्म देखकर
आओ मिलकर कसम यह खाएं
इस बात पर हम ध्यान देंगे
नारी से प्रेम करें न करें 
पर उनको सम्मान देंगे
इस संवेदनशील मुद्दे पर
कोई अपना कोई गैर नहीं
नारी का जबरन शील भंग
करने वालों की खैर नहीं

                                       ।। विक्रम कुमार ।।

हाथ कांपने लगे

होली पर गीत लिख रहा
हाथ कांपने लगे
हदय रोकर सवाल किया,
अरे शहीदों के घर पर
क्या होता होगा,
जब एक बुजुर्ग मां बाप का
हदय रोता होगा,
नन्हा सुकुमार बच्चा
जब त्यौहार पर
तैयार होकर
मां से सवाल किया"
वो मोहल्ले सब
अपने पिता के साथ
खरीदने बाजार जा रहे है,
मेरे पिता कहां है
वो कब आ रहे है,
मां क्या समझाती
खुद समझ में ना आता
बस भोले की बात सुनते
पीढा़ हदय को पहुंचाती
सामने वो मजंर जब
तिरंगा में लिपटकर
वो सदा के लिये देश का
हो गया,
अपने बच्चे को मौन
होकर क्या समझाती।।

।। अभिषेक राज शर्मा ।।