हार में छिपी हुई विजय-
पिता का दिव्य पराजय-वरदान
जीवन के इस मर्म को
धीरे से समझना चाहिए-
कभी-कभी पिता को
अपने ही पुत्र से हार जाना चाहिए।
यह हार पराजय नहीं,
यह प्रेम का उत्सव है;
जहाँ पिता का अहं झुकता है,
वहाँ पुत्र का भविष्य विकसित है।
पिता जब पीछे हटता है,
तो आगे बढ़ता है उसका ही अंश;
उसकी आँखों में गढ़ी आशाएँ,
उसकी वाणी में पलता है वह संस्कार-संश।
पुत्र की हर विजय में
पिता का ही पसीना मुस्कुराता है;
उसके कदमों की आहट में
पिता का तप, त्याग, ज्ञान गूँज जाता है।
इसलिए पिता की हार में
छिपा कोई दुख नहीं होता-
यह तो वही दीप है
जो स्वयं पिघलकर भी
संसार को रोशन करता है।
और जब पुत्र ऊँचा उठता है,
तो पिता का हृदय और नम्र हो जाता है;
उसकी प्रसन्नता का सूर्योदय
उसी क्षण उग आता है।
क्योंकि सच तो यही है-
जहाँ पुत्र की प्रगति दिखती है,
वहीं पिता की सबसे बड़ी जीत छिपती है;
और इस दिव्य सत्य को जानकर
हर पिता मन ही मन कहता है-
“हाँ, मुझे अपने पुत्र से हारना चाहिए…
ताकि मेरी ही रगों का उजाला आगे बढ़ता जाए।”
- नरेंद्र मंघनानी
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माँ एक तू ही मेरी आंखों का तारा है
एक तू ही अंधेरों का सहारा है;
तेरे होने से ही मौसम ये प्यारा है;
एक तू ही मेरी आंखों का तारा है।
तू ही जग से निराली है;
तू ही मेरी पूजा की थाली है;
तू ही मेरी गंगा की धारा में;
एक तू ही मेरी आंखों का तारा है।
तेरी चरणों में जन्नत का जुनून है;
तेरी आंचल के छांव में ही सुकुन है;
तेरे होने से धरा पर गुजारा है;
एक तू ही मेरी आंखों का तारा है।
तू ही सूखी जमी पर बरसात हो;
तू ही मेरी जिन्दगी की जज्बात है;
तू ही जिंदाबाद की नारा है;
एक तू ही मेरी आंखों का तारा है।
तुतली जबान को बोलना सिखाया;
लड़खड़ाती पैरों को चलना सिखाया;
तेरी दुवाओं से चकाचौंध जग सारा है;
एक तू ही मेरी आंखों का तारा है।
तुझे खुश देखना ही मेरी जिम्मेदारी है;
तेरे लिए मेरी ज़िन्दगी बलिहारी है;
तेरी दुवाओं से नफस हमारा है;
एक तू ही मेरी आंखों का तारा है।
- सदानंद गाजीपुरी
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किसान की कहानी
मेरी किस्मत, मेरी करुणा, बड़ी कर्मठ है मेरी कहानी,
मिट्टी की खुशबू-खुशहाली में, गुजरती मेरी जवानी,
हल की हर हरकत देता है, मेरी हिम्मत को पहचान,
माटी की ममता देती है मुझे, अन्नदाता का स्वाभिमान।
बीज, कोंपल, बेल, बूटी और बाली से, है मेरी खुशहाली
बीजने-बोने, पोषण करने में, मैं मनाता हूँ रोज दीवाली,
सूरज से पहले हूँ जगता, दिनभर की मेहनत से न थकता,
मेहनत, पसीना, फल और फूल पर हूँ विश्वास मैं रखता।
हल की चाल, हिम्मत का बल, हौसला मुझे देता पहचान,
धूप, मेघ, बर्षा और मिटटी, में ही बसती है अपनी जान,
अन्न उगता है इसी धरा से, है जो जीव जगत का आधार,
इस अमृत को धरा पर लाकर, मिलता है आनंद अपार।
लाख कष्ट सहकर भी खुश हूँ, मन में न मेरे है कोई क्लेश,
कांटे, कष्टों से लड़कर भी, आता नहीं मन में कभी द्वेष,
श्रम से मुझे नींद है आती, देकर अपने तन-मन की कुर्बानी,
मेरी किस्मत, मेरी करूणा, बड़ी कर्मठ है मेरी कहानी।
- धर्म चंद धीमान
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अब मुझे भूलना है
अब मुझे उसे भूलना है
किसी से अब टूटना है
बहुत सह लिये है अब,
किसी को रूलाना है
लेकिन भूलने से पहले
उनके दिल को जगाना है
भूला जो वो है, हमें
उसे याद तो कराना है
रोया हूँ जो मैं, उसके लिए
ये अहसास उसे कराना है
नफरत उसके दिल से
अपने प्रति पहले मिटाना है
फिर मोहब्बत का बीज बौ कर
उससे दूर मुझे जाना है
तड़प क्या होती है
तब उसे बताना है
खूब तड़पाया है ना मुझे
उसे अब तड़प बतानी है
अब मुझे उसे भूलना है
याद तो, उसे अब हर पल
अपने दिल में लाना है
जैसा करोगे, वैसा मरोगे
यही कहावत, सत्य करना है
चुन्नू कवि ने समझाया
कि बदले की भावना ना रखें
ये ठीक नहीं है लेकिन वो,
माने तब ना! उसे बस,
यही तो है कहना कि,
अब मुझे उसे है भूलना...
- चुन्नू साहा
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किसान बदल रहा
हल और बैल कहीं नजर नहीं आ रहा
इनकी जगह ट्रैक्टर ले रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
गोबर की जगह रासायनिक खाद ले रहा
खरपतवार भी इनके सहारे उखाड़ रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
फसल बुवाई-कटाई मशीनों से हो रहा
सिंचाई में भी इनका प्रयोग बढ़ रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
खेतों में पैदावार बढ़ रही
क्योंकि किसान उन्नत खेती कर रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
फसलों को कीड़ा कम लग रहा
समय-समय पर छिड़काव जो हो रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
पारम्परिक खेती से भाग रहा
नकदी फसलों को ही उगा रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
मंडियों तक आसानी से अनाज पहुंचा रहा
दाम भी शीघ्रता से पा रहा
सच कहूं तो किसान बदल रहा...
- विनोद वर्मा
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मुफलिसी में
गायब होते ही धूप के, साथ छोड़ गया अपना साया,
आया दौर मुफलिसी का, अपनों ने भी हाथ छुड़ाया।
खाकर कसमें जो कहते थे, हैं नहीं हम मतलबी,
गुजर गये पास से ऐसे, हों जैसे कोई अजनबी।
लगाई अपनी जिन्दगी, जिनकी जिन्दगी बनाने में,
हैं मशगूल वो हमें भूल, किस्से तरक्की के सुनाने में।
किये थे सजदे हमने, मांगी थी जिनके लिए दुआएं,
चढ़ते ही शोहरती चश्मा, वो गिरगिटी रंग दिखाए।
थकते नहीं थे जो दे-देकर, दोस्ती की अजब मिसालें,
भूल गये सब वो, कृष्ण-सुदामा की बातें करने वाले।
बनाकर उन्हें इज्जत काबिल, खूब दिया ऐशो-आराम,
मेरे मुफलिसी दौर में, हो गये सब क्यूँ नमक हराम।
गुजर जाएगा ये भी, फिर एक दौर नया आएगा,
शतरंजी इस दुनिया में जाने, फिर कौन मात खायेगा।
गायब होते ही धूप के, साथ छोड़ गया साया भी,
आया दौर मुफलिसी का, हाथ छुड़ा गये अपने भी।
- लता कुमारी धीमान
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अपनी राह पर चलो
जो इंसान दीप जलाता है,
ज्ञान का सूरज फैलाता है,
उसकी चमक से कुछ जलते हैं,
ताने कसते, शब्द फेंकते हैं।
पर वह मुस्कुराता नहीं,
चुपचाप अपनी राह गढ़ता है,
क्योंकि उसे पता है-
सच्ची सफलता शोर नहीं करती,
बस कर्म की गूंज छोड़ जाती है।
लोगों को चाहिए अपनी चिंता करना,
दूसरों की राह में काँटे न बिखेरना।
हर किसी की ज़िंदगी एक किताब है,
जिसे लिखना उसका अपना हिसाब है।
जो दूसरों पर टिप्पणी करता है,
वह अपनी राह खो देता है।
सच्चा विजेता वही कहलाता है,
जो बिना रुके आगे बढ़ जाता है।
- अंशिता त्रिपाठी
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किसी ने क्या ?
कहा ऐसा जिसे न तुम बता पाईं।
घटा न ठीक था सब-कुछ
न जिसको तुम भुला पाईं।
जख्म गहरे दिए उसने
जिसे हंस- हंस के सहती हो।
दिखावा हर्ष का करके
तन्हा में तुम सिसकती हो।
सिसक कर भी सबक क्या ?
तुम उसको सिखा पायीं।
दी जो छूट उसको है
करनी होगी भरपाई।
किया प्रतिरोध पहली बार
तुमने सही में होता।
तन्हा में आज तुमको यूं
सिसकना ही नहीं पड़ता।
तुम्हारा त्याग है भारी
नमन जिसको मैं करता हूं।
नहीं महफूज है नारी
जिसे लेकर मैं डरता हूं।
इबादत जिसकी करती हो
जरा तुम उनको भी देखो।
शस्त्र सज्जा में शामिल हैं
तनिक तुम उनसे भी सीखो।
किये क्यों ? शस्त्र धारण हैं
भामिनी तुम समझ पायीं।
किसी ने क्या ? कहा ऐसा
जिसे न तुम बता पाईं।
सुकोमल नम्रता का भाव
तुमने जग को दिखलाया।
नारी ममता की मूरत है
जिसे तुमने है बतलाया।
उठा कर शस्त्र अपनी शक्ति
उन दुष्टों को दिखला दो।
नहीं असहाय है नारी
शक्ति से तुम बतला दो।
तुम्हीं हो गार्गी
रम्भा मेनका और उर्वशी
स्वयं में हो तुम्ही विदुषी
नही कोई हो झषी।
त्याग दो भय निडरता से
खड़ी होकर के दिखला दो।
शकट निज हिंद की ये है
जिसे दौड़ा के दिखला दो।
बढ़ रहा हिंद आगे क्यों ?
क्या ? वनिता तुम समझ पायीं
किसी ने क्या ?
कहा ऐसा जिसे न तुम बता पाईं।
- करन सिंह 'करुण'
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जॅंगल में मॅंगल
जॅंगल में मॅंगल
एक बंदर झोपड़ी के अंदर
दमादम मस्त कलंदर
सबका साथ सबका विकास
अपनी बोतल अपना ग्लास
जाग मछंदर गोरख आया
जिसने खोया उसने पाया
इसकी टोपी उसका सिर
किसका जूता किसका सिर
गली में आज चाॅंद निकला
लालाजी का पाॅंव फिसला
हारे को हरिनाम
जीते को संसद
मैं तो आरती उतारूॅं रे
संतोषी माता की
ढूॅंढो ढूॅंढो रे भीडू ढूॅंढो
टूटी माला टूटी पायल
कौन बचा कौन घायल
हाजी खाये अंडा
पकड़ा जाये पंडा
खेल खत्म पैसा हजम
बोलो चाय डिब्बे में गरम...
- राजकुमार कुम्भज
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दोहा
अभिवादन नव वर्ष का, करता है संसार।
गुजर रहा जो साल है, उसका भी आभार।।
सीख गलतियों से सदा, यही धर्म उपदेश।
अपना कर्म सुधारना, देता यह संदेश।।
बीत रहे इस साल का, अंतिम है यह माह।
खुशियाँ हो नववर्ष में, सबके दिल में चाह।।
स्वागत है नववर्ष का, लिखना सुन्दर गीत।
प्रेम भाव मन में पले,आनंदित हों मीत।।
सत्य मार्ग पर सब चलें, करें कार्य हम नेक।
दया भाव मन में पले, कहलाये हम एक।।
ईश्वर से है कामना, निशदिन हो उत्कर्ष ।
खुशियों की बौछार हो, मंगल हो नववर्ष।।
अभिवादन नव वर्ष का, करता है संसार।
गुजर रहा जो साल है, उसका भी आभार।।
सीख गलतियों से सदा, यही धर्म उपदेश।
अपना कर्म सुधारना, देता यह संदेश।।
बीत रहे इस साल का, अंतिम है यह माह।
खुशियाँ हो नववर्ष में, सबके दिल में चाह।।
स्वागत है नववर्ष का, लिखना सुन्दर गीत।
प्रेम भाव मन में पले,आनंदित हों मीत।।
सत्य मार्ग पर सब चलें, करें कार्य हम नेक।
दया भाव मन में पले, कहलाये हम एक।।
ईश्वर से है कामना, निशदिन हो उत्कर्ष ।
खुशियों की बौछार हो, मंगल हो नववर्ष।।
- रिंकी सिंह
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