ओ री गौरेया
छोड़ सूनी अटरिया घर-घर की,
सूने आँगन और बगिया इधर की,
उदास अमरुद और अमिया तड़पती,
चली गई कहाँ तू, ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।
चहकता नहीं कोई आँगन में सवेरे,
फुदकता नहीं कोई यहाँ अब बिन तेरे ,
आता नहीं खिड़की से कोई कमरे में मेरे,
चली गई कहाँ तू ,ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।
आता नहीं कोई चोरी-चोरी डरते-डरते,
चुगता नहीं दाना कोई उटक -पटक के,
भरता नहीं छोटी उडारी पंख फड़क के,
चली गई कहाँ तू ,ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।
ओझल हुई बिन किये कोई गिला-शिकवा,
छोटी है तू पर है बड़ी तेरी महानता,
विकास के नशे में चूर कर गया बड़ी खता,
शोभा अपने आँगन की बैठा खुद ही गवा,
चली गई कहाँ तू, ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।
खुली है खिड़की मेरे कमरे की,
बिखरा हैं दाना, भरी है डिबरी पानी की,
अमिया और अमरुद ने भी शाखाएं है फैला दी,
गिन रही है अटरिया घड़ियाँ इंतज़ार की,
अब तो आजा तू, ओ री गौरेया,
माफ़ मुझे कर दे और आजा यहाँ तू।
- धरम चंद धीमान
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चूँ चूँ की पुकार
हवेलियों की छाँव में,
चहकी थी जो नन्ही चिरैया,
अब न आँगन, न वे वृक्ष रहे,
कैसे गूँजे चूँ चूँ की मैया?
खुले आँगन में बचपन बीता,
जहाँ चहकती थी मन की कली,
अब बँध गए फ़्लैटों की सींव में,
खिड़कियों में है बस एक छली।
अम्मा से माँगी रोटी की लोई,
बनाई छोटी-छोटी गोलियाँ,
लालचाते, बुलाते गौरैया को,
चहक उठतीं वे चिरैया बालियाँ।
हम भी संग उनके चहक उठते,
मन हुलसित, हो जाती अठखेलियाँ,
अब न जाने वे पंखुरी पखेरू,
कहाँ खो गईं नन्हीं सहेलियाँ।
पेड़ों पर बाँधो परिंडे जल के,
फैलाओ नेह का आह्वान पुनः,
तभी प्रकृति और पक्षी का राग,
बसेगा नव पीढ़ी में यथार्थ बन।
आओ मिलकर बचाएँ उनको,
चूँ चूँ की पुकार का मान करें,
हरीतिमा और नीड़ बसाएँ,
गौरैया का फिर सम्मान करें।
- सुरेश तनेजा अलवर
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घर के कोने में रहती
कभी भी किसी को तंग नहीं करती
मेरी प्रजाति हो रही है विलुप्त
हे मानव तेरे कारनामे है इसमें संलिप्त।
मुझे बचाने का चल पड़ा है अभियान
मैं रही हूँ शायद वातावरण की शान।
- विनोद वर्मा
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मैं नन्ही - सी जान ,
ऊंँची है मेरी उड़ान।
भला मैं कैसे ?
थक के हार जाऊंँ ,
मेरी भी बने पहचान।
मेरी भी चाह है!
नन्हें नन्हें कदमों से चलती जाऊंँ ,
पंख पसारे गगन में उड़ती जाऊंँ।
माना कठिन है दौर ,
कहीं नही है मेरा ठौर,
रुकेंगे वहीं पे मेरे कदम,
जहांँ में होगा मेरा स्थान ।
मैं नन्ही - सी जान ,
चेहरे पर है मुस्कान।
- चेतना सिंह
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आज के शहरों में गौरैया कहाँ है?
उसकी चहचहाहट अब सुनाई नहीं देती है।
इमारतें ऊंची हो गईं, पेड़ कट गए,
गौरैया का घर अब नहीं रहा।
आज के बच्चे मोबाइल में खो गए हैं,
गौरैया की चहचहाहट को नहीं सुनते हैं।
हमें गौरैया को बचाना होगा,
वरना वह हमेशा के लिए खो जाएगी।
आओ गौरैया को बचाएं, उसकी रक्षा करें,
हमारे पर्यावरण को सुरक्षित रखें।
- बीना सेमवाल
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नन्ही गौरैया
छोटी-सी चंचल गौरैया, आंगन में इठलाए,
टहनी-टहनी फुदक-फुदककर, मधुर राग यह गाए।
कभी सुबह की पहली किरण संग, स्नेह लुटाने आती,
तो कभी शाम की धूप सुनहरी में, गुनगुन गीत सुनाती।
माँ की गोदी-सी लगती थी, उसके नन्हे घोंसले की छांव,
पर अब खोजें इसे नज़रें, सूने पड़े हैं बाग़-बग़ीचे और गांव।
क्यों उजाड़ा उसका आशियाना, क्यों छीनी उसकी बहार ?
आओ संकल्प लें मिलकर, लौटाएं उसका संसार!
धरती की इस मासूम कली को, फिर से प्यार लुटाएँ,
हर घर-आंगन, हर उपवन में, गौरैया को बसाएं !
- डॉ. सारिका ठाकुर "जगृति"
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ए नन्ही सी गौरैया ,
ची ची करके शोर मचाए।
कभी इधर से कभी उधर से,
फुदक फुदक घर-घर जाए।
जब आ जाती है मुंडेर पर,
सबको अपने संग बुलाए।
टहनी टहनी पर जाकर के,
मधुर स्वर में गीत सुनाए।
सबसे पहले खुद जगाती,
और सबको ची ची करके जगाती।
कितना मन इसका चंचल है,
एक जगह ए कभी न रुकती।
- रामदेवी करौठिया
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बैठी गौरैया जाने क्या सोचे,
जरा सुस्ता लूं पल भर को या,
नापना चाहे अंबर को।
मन ही मन सोचे गौरैया,
मन ही मन विचार करे।
भले घूम लूं दुनिया सारी,
नहीं भूलूंगी अपने घर को।
दाना पानी चुग कर जब मैं,
फिर लौट कर घर को आऊंगी,
कंक्रीट के जंगल में क्या,
घर को सुरक्षित पाऊंगी।
इसी ग़म से उदास गौरैया,
बैठी यही विचार करे,
मोह माया में बैठी रहे या,
ऊंचे नभ में उड़ान भरे।
- कंचन चौहान
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आंगन की गौरैया
छोटी सी चिड़ियाँ ,नाम गौरैया,
कितनी ही प्यारी लागे रें।
सुबह सवेरे आंगन में आकर,
मुझे जगाती गीत सुनाती रें।
चीं-चीं करती दाना चुंगती ,
फिर पेड़ों पर उड़ जाती,
कितनी ही अपनी सी लागे रें।
- अनुरोध त्रिपाठी
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कितना अटूट विश्वास है मेरा और तुम्हारा ऐ गौरैया,
मेरे घरौंदे में इतने सालों से तुम्हारा घोंसला बनाना,
मानो हम दोनों का कोई अटूट रिश्ता है ऐ चिरैया।
- रचना चंदेल 'माही'
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सुबह सुबह आंगन में करती थी चीं चीं
फुदक फुदक कर मिलकर खाती थी दाना
मानव की तरक्की की मार में डूब गई
अब तो गौरेया को देखे हो गया ज़माना
- रवींद्र कुमार शर्मा
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सुबह सुबह जब मुझको दाना देती,
घर की औरतें तब मुझको बहुत भाती,
मैं भी चूं चूं करके सबको सुहाती,
बच्चे मेरे पीछे पीछे दौड़ते,
मैं भी भाग भाग के उनका मनोरंजन करती,
मत करो टेक्नोलॉजी को इतना भी एडवांस,
मिट जाए बची खुची मेरी पहचान।
- डॉक्टर जय अनजान
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आंखों का सुकून, नन्हीं सी मुस्कान हूं मैं।
कलरव करती अनार की उस शाख की शान हूं मैं।
हैसियत छोटी सी पर,छोटी सी ख्वाहिशें मेरी,
घरौंदा देखो मेरा, कारीगर भी बेमिसाल हूं मैं।
-कुणाल
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