साहित्य चक्र

20 March 2025

विश्व गौरैया दिवस- 2025 स्पेशल पंक्तियाँ



 ओ री गौरेया

छोड़ सूनी अटरिया घर-घर की,
सूने आँगन और बगिया इधर की,
उदास अमरुद और अमिया तड़पती,
चली गई कहाँ तू, ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।

चहकता नहीं कोई आँगन में सवेरे,
फुदकता नहीं कोई  यहाँ अब बिन तेरे ,
आता नहीं खिड़की से कोई कमरे में मेरे,
चली गई कहाँ तू ,ओ री  गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।

आता नहीं कोई चोरी-चोरी डरते-डरते,
चुगता नहीं दाना कोई  उटक -पटक के,
भरता नहीं छोटी उडारी पंख फड़क के,
चली गई कहाँ तू ,ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।

ओझल हुई बिन किये कोई गिला-शिकवा,
छोटी है तू पर है बड़ी तेरी महानता,
विकास के नशे में चूर कर गया बड़ी खता,
शोभा अपने आँगन की बैठा खुद ही गवा,
चली गई कहाँ तू, ओ री गौरेया,
कुछ तो बता दे अपना पता तू।

खुली  है खिड़की मेरे कमरे की,
बिखरा हैं दाना, भरी है डिबरी पानी की,
अमिया और अमरुद ने भी शाखाएं है फैला दी,
गिन रही है अटरिया घड़ियाँ इंतज़ार की,
अब तो आजा तू, ओ री गौरेया,
माफ़ मुझे कर दे और आजा यहाँ तू।

                                         - धरम चंद धीमान 

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चूँ चूँ की पुकार

हवेलियों की छाँव में,
चहकी थी जो नन्ही चिरैया,
अब न आँगन, न वे वृक्ष रहे,
कैसे गूँजे चूँ चूँ की मैया?

खुले आँगन में बचपन बीता,
जहाँ चहकती थी मन की कली,
अब बँध गए फ़्लैटों की सींव में,
खिड़कियों में है बस एक छली।

अम्मा से माँगी रोटी की लोई,
बनाई छोटी-छोटी गोलियाँ,
लालचाते, बुलाते गौरैया को,
चहक उठतीं वे चिरैया बालियाँ।

हम भी संग उनके चहक उठते,
मन हुलसित, हो जाती अठखेलियाँ,
अब न जाने वे पंखुरी पखेरू,
कहाँ खो गईं नन्हीं सहेलियाँ।

पेड़ों पर बाँधो परिंडे जल के,
फैलाओ नेह का आह्वान पुनः,
तभी प्रकृति और पक्षी का राग,
बसेगा नव पीढ़ी में यथार्थ बन।

आओ मिलकर बचाएँ उनको,
चूँ चूँ की पुकार का मान करें,
हरीतिमा और नीड़ बसाएँ,
गौरैया का फिर सम्मान करें।

                                       - सुरेश तनेजा अलवर

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घर के कोने में रहती
कभी भी किसी को तंग नहीं करती
मेरी प्रजाति हो रही है विलुप्त
हे मानव तेरे कारनामे है इसमें संलिप्त। 
मुझे बचाने का चल पड़ा है अभियान
मैं रही हूँ शायद वातावरण की शान। 

                                     - विनोद वर्मा 

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मैं नन्ही - सी जान , 
 ऊंँची है मेरी उड़ान।

भला मैं कैसे ? 
थक के हार जाऊंँ , 
मेरी भी बने पहचान। 

मेरी  भी चाह है! 
नन्हें नन्हें कदमों से चलती जाऊंँ , 
पंख पसारे  गगन में उड़ती जाऊंँ। 

माना कठिन है दौर , 
 कहीं नही है मेरा ठौर,

रुकेंगे वहीं पे मेरे कदम, 
जहांँ में होगा मेरा स्थान । 

मैं नन्ही - सी जान , 
चेहरे पर है मुस्कान। 


                               - चेतना सिंह

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आज के शहरों में गौरैया कहाँ है?
उसकी चहचहाहट अब सुनाई नहीं देती है।
इमारतें ऊंची हो गईं, पेड़ कट गए,
गौरैया का घर अब नहीं रहा।

आज के बच्चे मोबाइल में खो गए हैं,
गौरैया की चहचहाहट को नहीं सुनते हैं।
हमें गौरैया को बचाना होगा,
वरना वह हमेशा के लिए खो जाएगी।

आओ गौरैया को बचाएं, उसकी रक्षा करें,
हमारे पर्यावरण को सुरक्षित रखें।

                                                 - बीना सेमवाल

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नन्ही गौरैया 

छोटी-सी चंचल गौरैया, आंगन में इठलाए,
टहनी-टहनी फुदक-फुदककर, मधुर राग यह गाए।

कभी सुबह की पहली किरण संग, स्नेह लुटाने आती,
तो कभी शाम की धूप सुनहरी में, गुनगुन गीत सुनाती।

माँ की गोदी-सी लगती थी, उसके नन्हे घोंसले की छांव,
पर अब खोजें इसे नज़रें, सूने पड़े हैं बाग़-बग़ीचे और गांव।

क्यों उजाड़ा उसका आशियाना, क्यों छीनी उसकी बहार ?
आओ संकल्प लें मिलकर, लौटाएं उसका संसार!

धरती की इस मासूम कली को, फिर से प्यार लुटाएँ,
हर घर-आंगन, हर उपवन में, गौरैया को बसाएं !

                                         - डॉ. सारिका ठाकुर "जगृति" 


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ए नन्ही सी गौरैया ,
ची ची करके शोर मचाए।
कभी इधर से कभी उधर से,
फुदक फुदक घर-घर जाए।

जब आ जाती है मुंडेर पर,
सबको अपने संग बुलाए।
टहनी टहनी पर जाकर के,
मधुर स्वर में गीत सुनाए।

सबसे पहले खुद जगाती,
और सबको ची ची करके जगाती।
कितना मन इसका चंचल है,
 एक जगह ए कभी न रुकती।

                                           - रामदेवी करौठिया

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बैठी गौरैया जाने क्या सोचे,
जरा सुस्ता लूं पल भर को या,
नापना चाहे अंबर को।
मन ही मन सोचे गौरैया,
मन ही मन विचार करे।
भले घूम लूं दुनिया सारी,
नहीं भूलूंगी अपने घर को।
दाना पानी चुग कर जब मैं,
फिर लौट कर घर को आऊंगी,
कंक्रीट के जंगल में क्या,
घर को सुरक्षित पाऊंगी।
इसी ग़म से उदास गौरैया,
बैठी यही विचार करे,
मोह माया में बैठी रहे या,
ऊंचे नभ में उड़ान भरे।

                                         - कंचन चौहान

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आंगन की गौरैया

छोटी सी चिड़ियाँ ,नाम गौरैया, 
कितनी ही प्यारी लागे रें। 
सुबह सवेरे आंगन में आकर,
मुझे जगाती गीत सुनाती रें।
 चीं-चीं करती दाना चुंगती ,
फिर पेड़ों पर उड़ जाती,
कितनी ही अपनी सी लागे रें।

                                        - अनुरोध त्रिपाठी 

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कितना अटूट विश्वास है मेरा और तुम्हारा ऐ गौरैया, 
मेरे घरौंदे में इतने सालों से तुम्हारा घोंसला बनाना, 
मानो हम दोनों का कोई अटूट रिश्ता है ऐ चिरैया। 


                                         - रचना चंदेल 'माही' 

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सुबह सुबह आंगन में करती थी चीं चीं
फुदक फुदक कर मिलकर खाती थी दाना
मानव की तरक्की की मार में डूब गई
अब तो गौरेया को देखे हो गया ज़माना

                                              - रवींद्र कुमार शर्मा

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सुबह सुबह जब मुझको दाना देती,
घर की औरतें तब मुझको बहुत भाती,
मैं भी चूं चूं करके सबको सुहाती,
बच्चे मेरे पीछे पीछे दौड़ते,
मैं भी भाग भाग के उनका मनोरंजन करती,
मत करो टेक्नोलॉजी को इतना भी एडवांस,
मिट जाए  बची खुची मेरी पहचान।

                                    - डॉक्टर जय अनजान

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आंखों का सुकून, नन्हीं सी मुस्कान हूं मैं।
कलरव करती अनार की उस शाख की शान हूं मैं।
हैसियत छोटी सी पर,छोटी सी ख्वाहिशें मेरी,
घरौंदा देखो मेरा, कारीगर भी बेमिसाल हूं मैं।

                                     -कुणाल

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05 March 2025

कविता- उम्मीद



जहां बाड़ ही खेत को खाने लगे
किसी और से करें क्या उम्मीद
जब रक्षक ही भक्षक बन जाये
वह खेत कहां सुरक्षित रहेगा
जहां बाड़ ही खेत को खा जाये

जब खाखी ही बेचने लगे चिट्टा
युवाओं का भविष्य करने लगे बर्बाद
कैसे होगा सुधार कैसे सुधरेंगे हालात
बजाय सुधरने के बिगड़ जाएगा समाज

यदि खाखी चाहे तो दो दिन में हो जाये सुधार
लेकिन खाखी ही खाखी को कर रही शर्मशार
कानून के रखवाले डराते हैं धौंस जमाते हैं
कई बार तो करते हैं गरीब की इज़्ज़त पर वार

आजकल चिट्टे की गिरफ्त में हो गया है ज़माना
क्या बच्चे क्या बूढ़े क्या मर्द क्या जनाना
युवा पीढ़ी धंसती जा रही नशे के दलदल में
सभी को सोचना पड़ेगा कैसे है इनको बचाना

कौन चोरी करता है कौन चिट्टा बेचता और खा रहा है
खबर इनको सब होती है कहां क्या हो रहा है
अनजान बने रहते हैं आंख मूंद कर निकल जाते हैं
पता सब होता है इनको कौन कहां क्या बो रहा है

दीमक एक बार जो जड़ों में लग गई
वह पेड़ ज़्यादा समय तक टिक नहीं पायेगा
समय रहते कर लीजिए इस चिट्टे रूपी दीमक का इलाज
बचोगे नहीं जब पानी सिर से ऊपर चढ़ जाएगा।


                                 - रवींद्र कुमार शर्मा


03 March 2025

आस्था और रहस्य का संगमः अचलेश्वर महादेव मंदिर

भारत के मध्य प्रदेश में स्थित ग्वालियर, अपने ऐतिहासिक किलों और भव्य मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है अचलेश्वर महादेव मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि इसकी अद्वितीयता और रहस्यमय विशेषताएं इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं।





मंदिर का इतिहास और स्थापनाः- अचलेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में हुआ था और इसे परमार वंश तथा अन्य राजाओं का संरक्षण प्राप्त हुआ। मंदिर में स्थापित शिवलिंग को "स्वयंभू" कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि यह प्राकृतिक रूप से धरती के भीतर से उत्पन्न हुआ है। इस मंदिर का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों और स्थानीय लोककथाओं में भी मिलता है, जो इसके प्राचीन और पवित्र होने की पुष्टि करते हैं।


मंदिर का वास्तुशिल्पः- मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक हिंदू शैली में निर्मित है। मंदिर के मुख्य भाग में जटिल नक्काशी और पत्थरों का उपयोग इसे कलात्मक को और भव्य बनाता है। मंदिर परिसर में भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग के दर्शन करना हर भक्त के लिए आध्यात्मिक अनुभव होता है।

रहस्यमय जल स्रोतः- मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसका जल स्रोत है। यह माना जाता है कि शिवलिंग के नीचे से प्राकृतिक जल का प्रवाह होता है, जो शिवलिंग को हमेशा गीला रखता है। इस जल स्रोत की गहराई और उत्पत्ति आज भी रहस्य बने हुए हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस पर कई शोध हुए हैं, लेकिन इसका पूर्ण समाधान आज आज तक किसी को नहीं मिल पाया।





धार्मिक महत्वः- अचलेश्वर महादेव मंदिर को ग्वालियर का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। महाशिवरात्रि और श्रावण के महीने में यहाँ हजारों की संख्या में भक्त भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने आते हैं। इस दौरान मंदिर में विशेष अनुष्ठान, रुद्राभिषेक और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

स्थानीय मान्यताएं और किंवदंतियांः- स्थानीय लोग इस मंदिर को भगवान शिव का निवास स्थान मानते हैं। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा करने से न केवल जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है, बल्कि आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके प्रत्यक्ष अनुभूति हमने यहां रुद्राभिषेक में प्राप्त किया है।

आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्रः- यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि ध्यान और आत्मिक शांति प्राप्त करने का स्थान भी है। भक्त यहाँ बैठकर ध्यान करते हैं और अपने मन को शांति प्रदान करते हैं।

पर्यटन और सांस्कृतिक महत्वः- ग्वालियर आने वाले पर्यटकों के लिए यह मंदिर एक महत्वपूर्ण आकर्षण है। मंदिर की ऐतिहासिकता, वास्तुकला और रहस्य इसे हर आयु वर्ग के लोगों के लिए रोचक बनाते हैं।

निष्कर्षः- अचलेश्वर महादेव मंदिर ग्वालियर की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है। यह मंदिर न केवल शिवभक्तों के लिए आस्था का केंद्र है, बल्कि इसे देखने और अनुभव करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति का स्रोत है। यदि आप ग्वालियर आएं, तो इस दिव्य और ऐतिहासिक मंदिर के दर्शन अवश्य करें और इसके रहस्यमय सौंदर्य को करीब से महसूस करें।

अचलेश्वर महादेव मंदिर ग्वालियर, मध्य प्रदेश में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिसे इसके ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यहाँ की वास्तुकला और इतिहास इसे अद्वितीय बनाते हैं। 


                                            -  डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"


गज़ल- कोई नहीं



मुर्दों की बस्ती में यहाॅं ज़िंदा कोई नहीं।
आवाज़ हक़ की डर से उठाता कोई नहीं।।

हद पार हो गई है ज़ुल्मों सितम की अब। 
किस पर करें भरोसा की अपना कोई नहीं।।

अपने भी अपने अब यहाॅं अपने रहे कहाॅं।
नफ़रत की ऑंधी चल रही अच्छा कोई नहीं।।

मरना है सबको पैदा यहाॅं पर हुआ है जो।
ज़िंदा रहा जहाॅं में हमेशा कोई नहीं।।

ऑंखों में पट्टी बाॅंध के बे-अक़्ल जीते हैं।
ये चार दिन की ज़िंदगी समझा कोई नहीं।।

किसका शिकार हो रहा किसका विकास है। 
सब दिख रहा है मुल्क में अंधा कोई नहीं।।

बेख़ौफ़ है दरिंदे ये कैसा निज़ाम है।
इस बे-लगाम भीड़ में इंसाॅं कोई नहीं।।


                                                 - निज़ाम फतेहपुरी 



01 March 2025

कविता- गजब दस्तूर




सच्चाई की कद्र नहीं पर
झुठे का बोलवाला है
प्यासे की ग्लास है खाली पर
शराबी के हाथ भरा प्याला है।

कैसा है दस्तूर सनम
सत्य खड़ा अकेला है
जग में मची उथल पुथल
पर बेईमानों के घर मेला है।

कलि की है रीत गजब
पापी का जयकार यहाँ
पुण्य करोगे गर यहाँ
ठोकर की सरोकार वहाँ।

कैसे कैसे लोग दिखता
पैसे की हो रही जयकार
पॉकेट गर हो खाली यहाँ
मिलती अपनों से दुत्कार जहाँ।

अच्छा है कि मौन बैठो
किसी को कुछ ना बोल यार
कटु सत्य गर बोलोगे
लोग कोगें प्रहार  हजार।


                                                       - उदय किशोर साह