साहित्य चक्र

17 October 2022

कविताः मेरी बात अधूरी रह गई





तुमसे मिलने आई थी ,
कहनी थी तुमसे एक बात ,
तुमको देख कर भूल गई ,
तुम्हें देखती रह गई सारी रात ,
बात अधूरी रह गई।

दिल का क्या सुनाऊँ तुम्हें हाल
तेरे सिवाय ना आए कोई ख्याल
मन की बात , मेरे मन में रह गई ,
वह बात अधूरी रह गई।

संदेश तुम तक कैसे पहचाऊँ ,
तुम बिन कहीं अच्छा लगता नहीं ,
फोन , मैसेज करके भी पूरी ना होगी बात,
तुमसे मिलना हमारा जरूरी हो गया,
मेरी बात अधूरी रह गई।


लेखिका- चेतनाप्रकाश चितेरी

04 October 2022

चिंता से दूर वर्तमान में जिएं


विश्व में लगभग हर प्राणी चिंता से ग्रस्त है। चिंता एक मानसिक क्रिया है। हमारे समाज में कई लोग चिंता को अच्छा बताते हैं, क्योंकि चिंता करने से हम सामने वालों या अपनों के प्रति अपना प्यार और स्नेह आसानी से प्रकट करते हैं। चिंता हमारे मन के काल्पनिक संकल्पों की एक उपज है, जो हमारे भीतर की चेतना और रचनात्मकता को नष्ट कर देती है। हम सभी जानते हैं कि चिंता करने से हमारा समय और शक्तियों का क्षय होता है। चिंता से मुक्त होना बहुत ही कठिन है। अगर कोई व्यक्ति चिंता से ग्रस्त होता है तो चिंता से मुक्त होने में काफी समय लग जाता है।





चिंता का मुख्य कारण हमारे समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी से चिंता करने की प्रथा का चलते आना है। बचपन से ही हमारे मां-बाप हमें यह बताते हैं कि चिंता करना अच्छा है। मगर जब हम एकांत में बैठकर सोचते और देखते हैं तो पाते हैं कि चिंता हमारे अंदर एक डर की भावना पैदा करती है। जिसके कारण हम कई बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। हम किसी के प्रति चिंतित तभी होते हैं, जब हमारा स्वार्थ वहां छिपा होता है। हमारी चिंता का मूल कारण हमारे अंदर असुरक्षा की भावना है, जो हमें अंदर ही अंदर परेशान करती रहती है।

अगर हम वर्तमान में जीना सीखें तो हम चिंता से मुक्त हो सकते हैं या चिंता मुक्त जीवन जी सकते हैं। हमें नकारात्मक भविष्य और पीड़ादायक भूतकाल के बारे में ज्यादा सोच कर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। हमें अपने उज्जवल वर्तमान पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए और अपनी शक्तियों का इस्तेमाल अपने वर्तमान को बेहतर करने के लिए करना चाहिए। याद रखें शांति की अनुभूति हमें केवल आज हो सकती है ना ही भविष्य में और ना ही भूतकाल को याद करके। इसलिए हम सभी को अपने आज के बारे में सोचना चाहिए और दूसरों के प्रति शुभ भावनाएं रखनी चाहिए, ताकि हमारा आज प्रकाशमय और सुखमय हो। आइए चिंता से दूर वर्तमान में जीने का प्रयास करते हैं।

संपादक- दीपक कोहली


शीर्षक: जीवन में कठिनाइयों का दौर



मुश्किलें आने पर जो हिम्मत जुटा नहीं सकते,
दुखों का गम जो सहज से पी नहीं सकते..
दामन में भरी खुशियों को भी ऐसे लोग,
सही मायनों में कभी खुलकर जी नहीं सकते..




कहा जाता है कि मुश्किलें कभी बताकर नहीं आतीं। जीवन में आने वाली मुश्किलों और कठिनाइयों पर मनुष्य का कोई जोर नहीं चल पाता और इनके आने पर इनका सामना करना प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताओं,योग्यताओं और समर्थताओं पर निर्भर करता है ।कहने का तात्पर्य है कि कौन व्यक्ति समस्याओं को किस प्रकार लेता है अर्थात वह समस्याओं के आगे अपने घुटने दे देता है और हार मान लेता है अथवा समस्याओं का डटकर सामना करता है और उनके समाधान के लिए कोई ना कोई तरकीब अवश्य निकाल लेता है। समस्याओं के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकता है ।कुछ व्यक्ति स्वयं को इस स्थिति में नहीं पाते कि वे अचानक से आने वाली समस्याओं और मुश्किलों को झेल पाएं, वहीं दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो इस प्रकार की चुनौतियों का सामना डटकर करते हैं और काफी हद तक जीत भी हासिल करते हैं ।वे समस्याओं को चुनौती के रूप में लेते हैं और पूरे तन, मन और धन से इन पर विजय पाते हुए जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। वास्तव में यही तो है जीवन की सच्चाई। जीवन जीने का सही अंदाज भी यही होता है।

अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि जीवन में कठिनाइयों का दौर जब आता है तो साथ में और भी अनेक प्रकार की मुसीबतें साथ लेकर आता है और ऐसे दौर में हमारे सगे संबंधी और अति निकट के मित्र भी हमारा साथ छोड़ देते हैं अर्थात कोई भी हमारी सहायता के लिए आगे हाथ नहीं बढ़ाता ।परंतु मेरे हिसाब से इस प्रकार की सोच रखना ही कमज़ोरी की सबसे बड़ी निशानी है क्योंकि जब हम स्वयं में दूसरों से अपेक्षा करने की आदत डाल लेते हैं तो ही हमारे भीतर इस प्रकार का नकारात्मक दृष्टिकोण पनपने लगता है कि फलां आदमी ने हमारी अमुक मुश्किल समय पर मदद नहीं की और हम उनके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने लगते हैं, और फिर शुरुआत होती है हमारे आपसी संबंधों और रिश्तों के खराब होने की, जो किसी भी सूरत में सही नहीं है ,क्योंकि आपसी मेल मिलाप, मिलना जुलना ,संबंध रखना एक सामाजिक व्यवहार है ,परंतु इस व्यवहार को यदि हम इस प्रकार से लेना शुरू कर दें कि यदि हमें मुश्किल समय का सामना करना पड़े तो उस समय हमारे मित्रगण और सगे संबंधी हमारे आवश्यक रूप से काम आएं ही आएं ,तो ,यह बिल्कुल गलत सोच है ,यह पूर्णतया हमारी स्वार्थी मानसिकता को दर्शाता है।दूसरों से मदद लेना गलत नहीं है, किंतु ,अपेक्षाएं रखना गलत है । इसलिए स्वयं को इतना सक्षम ,समर्थ और मजबूत बनाएं कि हम सभी अपने जीवन में आने वाली दिक्कतों का सामना स्वयं मजबूती से कर सकें।

दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके जीवन में दुख परेशानियां, कष्ट ,संकट चुनौतियां, समस्याएं न आती हों, यह हम पर निर्भर करता है कि हम उन चुनौतियों को किस प्रकार अपने जीवन में शामिल होने देते हैं । मैं अक्सर एक कहावत सुना करती हूं कि एक पीढ़ी को अगली पीढ़ी को राहत और सुकून देने के लिए कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ता है ,संघर्षरत रहना पड़ता है अर्थात एक पीढ़ी संघर्ष करती है और उसकी आगे आने वाली पीढ़ी जीवन को आनंद पूर्वक जीती है, फिर उसके बाद आने वाली पीढ़ी संघर्ष करती है और इसी प्रकार यह क्रम चलता रहता है, परंतु मैं इस बात से कतई सरोकार नहीं रखती ।मेरे अनुसार प्रत्येक पीढ़ी अपने कर्मों और पुरुषार्थ के बल पर ही अपना जीवन जी सकती है ।पुरखों द्वारा प्राप्त सुख संपदा का एक सीमा तक ही आनंद उठाया जा सकता है ,किंतु यह कतई सत्य नहीं है कि यदि हमारे पूर्वजों ने विरासत में हमारे लिए काफी कुछ छोड़ा है तो हम सुखी रहेंगे ही ।भौतिक सुखों की बात छोड़ दें, तो इसके अतिरिक्त भी हमारे जीवन में अनेक प्रकार के अन्य सुखों की कामना हम करते हैं जिसका अर्थ से, पैसे से कोई विशेष लेन-देन नहीं होता।अक्सर हमें अपने रोजमर्रा के जीवन में ऐसे अनेक लोग दिखाई देते हैं जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं होती ,परन्तु,फिर भी वे लोग सुखी, खुश और संतुष्ट नहीं दिखते हैं ,अर्थात पैसे की अहमियत एक सीमा तक ही होती है उसके बाद वास्तविक सुख तभी मिल पाता है जब हम भीतर से खुश हों ,संतुष्ट हों और यह तभी संभव है जब हम अपने जीवन में शुभ कार्य करें, अपने जीवन में आने वाले दुख ,कष्ट और परेशानियों का डटकर सामना करें, चीज़ों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखें और दूसरों का कभी अहित न करें ,अपनी जिम्मेदारियों का पूरी निष्ठा से निर्वहन करें और अपने साथ-साथ अपने समाज ,अपने देश और पूरे विश्व के कल्याण की बेहतरी के लिए सदैव प्रयासरत रहें।


                                                      लेखिका- पिंकी सिंघल


कविताः समाज के लिए घातक लोग




घातक होते है वो पुरुष समाज के लिए जिनकी
 सोच उनकी नजर  से भी गंदी होती है।

जो झाँकती है बच्चियों और महिलाओं के बदन को,
साड़ी पहनी हो उस ने या पहना हो  सलवार सूट।

पर उन की गंदी नजर औरतों के बदन को नापती है।

कुछ तो बेटी और बच्चियों को भी नोच खाते है।
फ्रांक और स्कर्ट में अपनी सोच की लार बहाते है।

बस उन की नजर उन की सोच से छोटी होती है।
जो वस्त्रों के अंतर वस्त्रों को टटोलती है।

यदि करने जाते पूण्य स्नान गंगा के तट पर भी
नही रोक पाते वो नयनों की ताका झांकी को।

निहारते रहते कपड़े बदल रही नारी को।

कुछ महिलाएं भी घातक बन जाती है समाज के लिए
जो परोसती खुद को और लालच बढ़ाती है मर्दो का

फैशन की अंधी दौड़ में बदनों की निवाइश करती है।
चंद इंचों के ड्रैस पहन कर खुद पर इतराती है।

उन चंद बिकाऊ बदनों की वजह से शिकार होती है
छोटी बच्चियां दरिदंगी और हैवानियत का ।

घातक है ये लोग समाज के लिए जो 
गंदी सोच और गंदी नजर लिए फिरते है।


                                                     लेखिका- संध्या चतुर्वेदी


दलित-आदिवासियों का ब्राह्मणवाद को चुनौती

दलित व आदिवासी युवाओं द्वारा ब्राह्मणवादी मिथकों को चुनौती दी जा रही है। दुर्गा और राम के मिथक और ब्राह्मणधर्म की उदारता और महानता को चुनौती दे दी गई है। इस से काफी बेचैनी फ़ैल गई है। लेकिन अब तो यह चुनौती बढ़ती ही जायेगी, क्योंकि आदिवासी दलित जो अब तक शिक्षा से वंचित थे।




अब आजादी के सत्तर साल के बाद वे गूगल और सोशल मीडिया की ताकत से लैस हैं। वे इतिहास खोज रहे हैं आपस में बैठ कर अपने बूढों से कहानियां सुन रहे हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर एक दुसरे से साझा करके उसे व्यापक समझ के रूप में विकसित कर रहे हैं। आदिवासियों और दलितों के द्वारा उनके नायकों को खलनायक दिखा कर उनके वध करने और उनके पुतले जलाने के आयोजनों के खिलाफ पुलिस रिपोर्टें कराई जा रही हैं।

यह एक नए युग की शुरुआत है। अब तक एक ही तरफ की कहानियां सारे देश को सुनाई जाती रही हैं। स्कूल की किताबों में रेडिओ में अखबारों में टीवी पर एक ही तरफ की कहानियां सुनाई गईं हैं।इनमें आदिवासियों को राक्षस, दैत्य, पिशाच, बन्दर भालू दिखाया गया है, लेकिन अब आदिवासी और दलितों द्वारा इन एकतरफा कहानियों को चुनौती दी जा रही हैं, यह स्वाभाविक भी है। पहले हज़ारों सालों तक दलितों आदिवासियों को ज्ञान से दूर रखा गया, लेकिन अब लोकतंत्र के लागू होने के बाद हालत बदल रही है।

इसलिए अब तक इन मिथकों के आधार पर खुद को देवता साबित करने वाले लोग बहुत घबराए हुए हैं। वे कह रहे हैं कि यह नकली कहानियाँ हैं आपको कुछ नहीं पता है वगैरह वगैरह, यह भी कहा जा रहा है कि आप लोग गड़े मुरदे उखाड़ रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि अरे यह रामायण वगैरह तो कहानियां हैं आप इन्हें सच सिद्ध क्यों करना चाहते हैं ?

लेकिन हमें एक बात पर ध्यान देना चाहिए कि आज तक इन्हीं कहानियों के आधार पर इस देश में एक समुदाय खुद को महान, उदार और अच्छा साबित करता रहा। इन वर्णनों के आधार पर खुद को देश पर शासन करने के लिए सबसे महान साबित किया गया। इसी श्रेष्ठता के दावे के आधार पर इस देश की राजनैतिक सत्ता फिर सामाजिक रुतबा और फिर संसाधनों पर कब्ज़ा करा गया।

असल में घबराहट की असली वजह यही है। कि एक बार यह सिध्ध हो गया कि आप ना तो अतीत में सभ्य और उदार थे। ना ही आप आज सभ्य और उदार हैं, आपका अतीत और वर्तमान हत्याओं दमन भेदभाव से भरा हुआ है। तो इस देश के राजनैतिक आदर्श भी बदल जायेंगे। अगर आप राममन्दिर के नाम पर सत्ता पर कब्ज़ा कर सकते हैं। तो राम के चरित्र के खंडन से आपका राजनैतिक वर्चस्व भी टूट जाएगा। आप इसे ठीक से समझिये। दलितों आदिवासियों की दिलचस्पी अतीत की कहानियों में सुधार के लिए लिए दावेदारी करने की नहीं हैं।

दलित और आदिवासी युवा आपके राम और दुर्गा के मिथकों के विरुद्ध नहीं है। वह आपके विरुद्ध है। दलित आदिवासी युवा आपके सवर्ण, शहरी अमीर वर्चस्व के विरुद्ध है। आपके द्वारा लगातार दलितों और आदिवासियों को नीच समझने उनके साथ अपमान जनक भाषा में बात करने उनके संसाधनों को दादा गिरी से छीनने के खिलाफ दलित आदिवासी युवा का यह बिलकुल जायज़ विद्रोह है। उन्हें तो आपसे वर्तमान में ही दो दो हाथ करने हैं और आपको पटखनी देकर सत्ता में बराबरी करनी है।

आप उनका लगातार अपमान करते हैं। लगातार उनकी ज़मीनें छीनते हैं, सुरक्षा बल भेज कर उनकी महिलाओं से बलात्कार करवाते हैं। ताकि आदिवासी डर जाएँ और आपका विरोध ना करें। और फिर आप मूंछ मरोड़ कर कहते हैं कि हमें तो जनता ने सत्ता में बैठाया है। आप दावा करते हैं कि आप गोभक्त राष्ट्रभक्त महान धर्म के उदारवादी और महान सभ्यता के वंशज हैं।

लेकिन आपके काम लूटने बलात्कार करने और हत्या करने के हैं, तो आदिवासी और दलित आपकी मक्कारी को चुनौती दे रहे हैं। आप मीडिया को डरा सकते हैं खरीद सकते हैं आदिवासियों और दलितों के खिलाफ आपके अत्याचारों की खबरों को शहरी समाज तक आने से रोक सकते हैं, लेकिन आदिवासी और दलित अपने आपस में जो सोशल मीडिया के मार्फ़त खबरों का आदान प्रदान कर रहा है।

वह आपकी नज़रों से दूर है। एक क्रान्ति खदक रही है। मैं इंतज़ार में हूँ कि यह ज्वालामुखी कब फूटता है। आप कह सकते हैं कि मैं शान्ति के पक्ष में नहीं हूँ। आपने बिलकुल ठीक समझा, मुझे अगर न्याय और शांति में से एक चीज़ चुननी हो तो मैं न्याय को चुनूंगा। क्योंकि अन्याय के मौजूद रहते हुए जो शान्ति होगी वह श्मशान की शान्ति होगी। मैं इस समाज के शमशान बनने के विरुद्ध हूँ।मुझे एक जिंदा समाज पसंद है जो कभी भी कहीं भी किसी के साथ भी अन्याय को बर्दाश्त ना करे, साफ़ साफ़ समझ लीजिये मैं बगावत की तरफ हूँ। दलितों और आदिवासियों द्वारा इस विरोध का मैं पूरी तरह समर्थन करता हूँ।

- हिमांशु कुमार