साहित्य चक्र

27 January 2021

इसीलिए


इसीलिए
दर्द कम नहीं था
इसीलिए
बेदर्द होना पड़ा।
हमसफ़र कोई नहीं मिला
इसीलिए
हम राही होना पड़ा।
राज बहुत दफन थे
इस तड़फते दिल में
इसीलिए
हमराज होना पड़ा।
दिल बहुत दुखता था
अपनों के दिए गम से
इसीलिए
महाकाल की भक्ति में
चूर होकर
मुझे भी काल होना पड़ा।

                              राजीव डोगरा 'विमल'

“गृहिणी तो गृहिणी है”





लॉकडाउन हुआ देखो देश में,
सब को हुआ है अवकाश।
गृहिणी को छुट्टी आज भी नहीं,
वो कितनी होगी बदहवास।।

वो खुश तो दिख रही है बहुत,
सभी अपने जो है उसके पास।
मन में कौन झाँके उसके,
कौन बनाए जीवन को खास।।

खा – पी कर सब बैठ जाते,
पकड़ कर हाथों में अपने फोन।
वो कुछ कहना भी चाहे मन की,
किसे फुरसत यहाँ उसकी सुनता कौन।।

गर वो भी उठा ले फोन घड़ी भर,
टिक जाती है नजरें सबकी उस पर।
काम फिर दिखते नहीं किसी को उसके,
बैठ जाते हैं सारे सुनाने को सिर पर।।

गृहिणी तो गृहिणी ही है न,
उसको तो बस करना है घर का काम।
कोई समझना ही नहीं चाहता उसको,
कि है उसके भी कुछ अरमान।।

                                                  कला भारद्वाज

भारतीय मीडिया से जनता का भरोसा क्यों उड़ रहा है..?

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, मगर वर्तमान में भारतीय मीडिया का जो हाल है, उसे देख कर ऐसा लगता है कि भारतीय मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं बल्कि सत्ता पक्ष का पांचवा स्तंभ है। जिस प्रकार से हमारे देश में आए दिन मीडिया की हकीकत सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता तक पहुंच रही है। उसे देख कर लग रहा है कि भारत में मेंस्ट्रीम मीडिया का अंत जल्दी होने वाला है।


जिस मीडिया का काम तभी सरकार से सवाल करना और सरकार की योजनाओं की जांच करना होता था आज उसी मीडिया का काम सत्ता में बैठे लोगों की वाहवाही करना हो गया है। आए दिन हमारे देश के न्यूज़ चैनलों में बहस होती है। मगर इन बहसों का स्तर मानो जैसे गांव घरों में मम्मी काकी आपस में लड़ रही हो। वर्तमान की मीडिया लोकतंत्र ही नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। आज हमारी यहां के न्यूज़ चैनल अपने निजी स्वार्थ के लिए कभी हिंदू-मुस्लिम, ब्राह्मण-दलित, जैसे मुद्दों को लाकर राष्ट्र व देश की प्रमुख समस्याओं को छुपाकर सरकार का साथ दे रही है। आज हमारे यहां की मीडिया सत्ता पक्ष से नहीं बल्कि विपक्षी से सवाल करती है। हमारे न्यूज़ चैनलों में किसान, खेती, मजदूरी जैसे मुद्दों पर नहीं बल्कि एक अभिनेता की मौत पर 2-3 महीने बहस होती है। कोरोना काल में हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई मगर हमारी मीडिया को इसकी भनक तक नहीं लगी। करोड़ों लोगों के रोजगार चले गए हैं, मगर हमारी मीडिया सत्ता पक्ष की वाहवाही और पार्टी खाने में इतनी व्यस्त है कि उसे देश की गरीब जनता व किसानों का हाल तक नहीं दिखाई दे रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाला भविष्य इस से भी खतरनाक होगा यानी अन्य किसी पार्टी की सरकार आएगी तो वह भी ऐसे ही मनमानी करेगी। जिससे देश की गरीब जनता, किसान और मजदूर लोग परेशान रहेंगे। मेरी व्यक्तिगत राय है वर्तमान की मीडिया को त्याग कर सोशल मीडिया के माध्यम से हकीकत को जानना का प्रयास करना चाहिए। आशा करता हूं आप मेरे इस लेख से सहमत होंगे।

दीपक कोहली


16 January 2021

लघुकथा- अधूरे ख्वाब



रोशन अपने दोस्त शंकर के साथ ढावे पर बैठ कर चाय की चुस्की ले रहे थे सर्दी कर महीना था हल्की हल्की बूंदा बांदी हो रही थी आपस मे बातचीत हो रही थी कि हम दोनों बचपन से ही अजीज़ दोस्त थे साथ साथ स्कूल मे पढ़े लिखे और खेल कूद कर बड़े भी हुए यार तुमने तो कारोना काल में कमाल ही कर दिया तुमने बचपन मे अधूरा ख्वाब जो देखा था वे अब पूरा हो रहा है तुम तो एक चित्रकार व साथ साथ मे कवि भी हो गए तुम्हारी कविताएं तो बेहतरीन, संदेश पूर्ण, होती है चित्रकारी तो गजब की पोर्ट्रेट स्कैच के तो क्या कहने स्कूल के समय मे तुम्हें चित्रकारी का जो शौक था, लगन व आस्था, और जो विश्वास था, यह उसी का नतीजा है तुमने बहुत मेहनत की श्री गुलशन जी जो की स्कूल के समय ड्राइंग टीचर थे तुमसे बहुत खुश रहते थे ड्राइंग प्रतियोगिता मे हर बार सर्व प्रथम आते थे सम्मान समारोह मे जब तुम सम्मान पत्र ग्रहण करते स्टेज पर तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हाल गूंज जाता था तुम्हारी कला और कविता दोनों को नमन  करता हूँ।

धन्यवाद दोस्त तुमने सही कहा इस लॉक डाउन मे मुझे भरपूर समय मिला उसका मैंने सदुपयोग किया दिन न देखा रात बस ऐसी लगन लगी कि सम्मान पर सम्मान पत्र की लड़ी ही लग गई इस दौरान मुझे राजस्थान से बच्चों की ड्राइंग प्रतियोगिता मे आपने देश के भिन्न राज्यों से 95 बच्चों ने प्रतिभाग किया मुझे मुख्य समीक्षक की भूमिका अदा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसमे 5 बच्चों को सम्मान के लिए चुना गया और मुझे समाज गौरव सम्मान से नवाज़ा गया।

मेरी एक कलाकार चित्र संग्रह हरियाणा से मेरी चौपाल से छपा मुझे साहित्य संगम संस्थान दिल्ली इकाई से नायाब कलाकार की उपाधि से नवाज़ा गया माँ शारदे की अनुकम्पा से ही जो मेने ख्वाब देखे थे अधूरे थे वो पूर्ण हूए चाय कब समाप्त हो गई पता ही ना चला अच्छा दोस्त नमस्ते, चलता हूँ फिर मिलेगें बॉय बॉय...!


                                                                                     शिवशंकर लोध राजपूत 


एक बचपन का किस्सा कैसे होता था हमारा नए साल का जश्न...?


यह किस्सा मेरे बचपन का है। हमारे परिवार में करीब 5-10 बच्चे हुआ करते थे। जब साल का अंतिम दिन हुआ करता था, तब सभी लोग बोला करते थे कि थर्टी फर्स्ट की पार्टी रखेंगे। मगर समस्या वहां पर उत्पन्न हो जाती जब हम बच्चों के पास पैसे नहीं हुआ करते थे और परिवार इतना अमीर नहीं था कि वह हमें पार्टी के लिए पैसा दे सकता था। लेकिन एक बात है जो बहनें होती हैं वह अपने स्कूल की कॉपियों में 10, 5, 20 रुपये छुपा कर रखते थे। हम बच्चे बड़ी बहनों के स्कूल के बैग चेक करके उनके कॉपियों के बीच से पैसा निकाल लिया करते थे। पार्टी के लिए आलू, सूजी, तेल, आटा, मसाले लेकर आते थे। उस दिन हम सभी एक ही कमरे में रहते थे। पुरानी पुरानी बातें होती थी, मम्मी, पापा, दादा जी, चाचा, ताऊ, चाची, ताई सब लोग थोड़ी देर आते थे उसके बाद चले जाते थे। लेकिन हम सभी बच्चे उनसे बहुत चालाक थे हम पार्टी का खाना बनाना रात के 10,11 बजे से शुरू करते थे। गांव में रहा करते थे तो इसलिए पापा मम्मी लोग जल्दी सो जाते थे। पार्टी के दौरान नाच गीत से लेकर कई सारे कार्यक्रम हुआ करते थे। कभी-कभी मार पिटाई का भी कार्यक्रम रखते थे। यह सुनिश्चित था कि एक व्यक्ति पार्टी के दौरान जरूर रोएगा। शुरू शुरू में पार्टी का आयोजन स्थल चाचा का घर या हमारा घर हुआ करता था, बाद में हमने उसे गांव के धार्मिक स्थल पर बनाना शुरू कर दिया। जब मैं गांव से 12वीं पास करके निकला तो बहुत बुरा लगा मगर मुझे अपने जीवन की शुरुआत भी तो करनी थी ना, इसलिए मैंने अपने आपको समझाया और एक नए जीवन की ओर अग्रसर हो गया। खाना पीना बना कर और खा कर 12:00 बजने का इंतजार करते थे। जैसे ही 12 बजते थे तो वैसे ही हमारा ढोलक और शोर-शराबा शुरू हो जाता था। 1-2 भाई लोग ऐसे थे जो सीटियां अभी बजाते थे। इस दौरान हम सभी भाई बहन एक दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते और गले मिलते थे। इसके बाद हम सभी लोग सो जाते थे और सुबह 5:00 बजे उठते थे। 5 बजते ही हमारा, स्नान, योग और धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो जाता था। यह सभी चीजें मेरे दिमाग में चलती थी, बच्चे आज भी मेरे साथ पहले जैसे ही रहते हैं। मैं सभी बच्चों की बातों को सुनता था सुनता हूं आगे भी सुनता रहूंगा। मगर बचपन की बहुत याद आती है। यहां पर मैं एक छोटी सी बात कहना चाहूंगा एक बार हम एक बहुत बड़े मंदिर में गए थे। उस मंदिर में जो व्यवहार हमारे दोस्तों के साथ हुआ मैं उसे यहां बता भी नहीं सकता हूं। तब से मैं मंदिर नहीं जाता हूं। अगर कभी मजबूरी में जाना भी पड़ता है तो कभी भी दर्शन नहीं करता हूं, सिर्फ बाहर खड़ा रहता हूं।

आज साल का अंतिम दिन है इसीलिए सभी बहनों और भाइयों की याद आई तो सोचा कुछ यादों को आप सभी के साथ साझा करू। आप सभी को एक बार फिर से आने वाले नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं...।

दीपक कोहली