साहित्य चक्र

29 May 2021

कुछ इस तरह


हम बिखरगे
कुछ इस तरह
कि तुम संभाल भी न पाओगे।
हम टूटेंगे
कुछ इस तरह
तुम जोड़ भी न पाओगे।
हम लिखेंगे
कुछ इस तरह
कि तुम समझ भी न पाओगे।
हम सुनाएंगे दास्तां
कुछ इस तरह
कि तुम कुछ कह कर भी
न कह पाओगे।
हम जाएंगे इस जहां से
कुछ इस तरह
कि तुम्हारे बुलाने पर भी
कभी लौटकर न आएंगे।

 

                                          राजीव डोगरा 'विमल'



लाचारी की तस्वीर का सच...




हीरा का परिवार मध्यम वर्गीय था। उसके परिवार की आय का स्त्रोत हीरा ही था। वह एक छोटी सी दुकान करता था। साप्ताहिक हाट बाजारों में व्यवसाय कर वह जीवन यापन के लिए कमा लेता था। वह जितना मिल रहा था उसी में खुश था। जिस दिन वह बाजार करने नहीं जाता था। अपना समय परिवार, इष्ट मित्रों एवं सहयोगियों के साथ बिताता था । वह व्यवहार कुशल भी था। उसका एक बेटा था ,जो ग्यारहवीं कक्षा में पड़ रहा था। उस साल महामारी के कारण लॉक डाउन लग गया ।शासन ने सभी साप्ताहिक हाट बाजार बंद करने के आदेश दे दिए थे। वह रोज ही समाचार पत्र पढ़ता था सो स्थानीय खबरें भी उसे मिल जाती थी। लॉक डाउन के चलते कुछ समाजसेवी गरीबों की मदद कर रहे थे जिसमें उसके कुछ रोज उठने बैठने वाले भी थे ।

हीरा संतोषी व्यक्ति था। उसने ज्यादा चिंता नहीं की,और परिजनों से बोला कुछ दिनों की बात है। महामारी खत्म होते ही फिर बाजार करने लगूंगा। कुछ दिन बीत गए हीरा अपनी जमा पूंजी से खर्च चला रहा था। परंतु महामारी का प्रकोप बढ़ने से लॉक डाउन भी बढ़ा दिया गया। अब हीरा की जमापूंजी भी खत्म हो रही थी,परिवार चलाना मुश्किल हो रहा था। 

इसी बीच बीमारी ने हीरा को घेर लिया। वह बीमार हो गया। बीमारी के दौर में हीरा का परिवार टूटने लगा था।उसके बच्चों का खाने का जुगाड़ भी मुश्किल हो रहा था। कोई भी उसकी खबर पूछने वाला नहीं था, न वो समाजसेवी उसके घर का हाल जानने पहुंचे थे। जो उसके परिचित एवं जानने वाले थे। मुश्किल वक्त गुजर गया, धीरे धीरे हीरा की बीमारी ठीक हो  रही थी । लॉक डाउन भी खुल गया था।वह फिर से कारोबार करने के लिए हाट बाजार जाने लगा था।उसको आमदनी होने लगी थी।  उसके परिवार की भोजन की व्यवस्था हो गई थी। 

एक दिन हीरा दिहाड़ी व्यवसाय करने नहीं गया था। उस दिन अचानक उसके घर के  दरवाजे को कोई खटखटाता है।उसका परिवार चौक उठा , हीरा ने दरवाजे खोल कर देखा तो चार पांच लोग उसके दरवाजे पर खड़े थे।इसमें हीरा के परिचित समाजसेवी भी थे।परिचित होने के कारण हीरा ने सभी को अंदर बुला लिया। हीरा कुछ समझ पाता उससे पहले एक युवक ने पांच किलो आटे की थैली और दो किलो शक्कर देते हुए कहा आपकी बीमारी के बारे में पता चला था।हम लोग गरीबों को राशन बांट रहे हैं। आप थोड़ा इस आटे की पालीथीन को पकड़कर खड़े हो जाइए ........ कुछ लोग हीरा के बाजू में आ गए और एक युवक ने  मोबाइल में फोटो खींच ली। हीरा का माथा ठनका उसने फोटो वाले को टोंकते हुए कहा रुको और समाजसेवा के नाम पर ढोंग करने वाली टोली से मुखातिब होते हुए कहा आपने हमें पांच किलो आटा दिया .... मेहरबानी है! 

आप ये सब किसी गरीब की सहायता कर रहे हो या उसके परिवार की लाचारी का तमाशा बना रहे हों। दूसरे दिन अखबार में हीरा और समाजसेवियों की तस्वीर के साथ केप्शन छपा था । नगर के समाजसेवियों  ने गरीबों को एक हजार खाद्यान्न किट बांटी।


 

                                          लेखक- राजेश शुक्ला


विडम्बना भी आत्महत्या कर ले

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विवाह के लिए 
लड़की देखने वाले आ रहे... 
सुनकर लड़की अंदर तक हर्षित
एक तरफ घर छूटने का दर्द
दूसरी तरफ़ पति प्रेम की ललक
फिल्मों के गानें तैरने लगे मन में
देह की हर इंद्रिय के द्वार से खुले
हर द्वार पर काल्पनिक पति..! 
तभी एकाएक माँ ने चेताया
मंदिर आ गया आखें खोलो
वो सब लोग वहीं है.. 
साड़ी ठीक करो... 
मंदिर पहुंचकर कुछ समझ पाती
कि दागे जाने लगे थे सवाल.. 
पहला सवाल... 
तुम्हें खाना बनाना आता है? 
न सपने पूछे? न पूछी पसंद
लड़की का पर्यायवाची 
आज रसोई सा लगा... 
मन हुआ खिन्न परन्तु प्रसन्न.. 
आखें खोज रहीं थीं पति
तभी कोई मूँछ पर ताव लिए 
दाग दिया दूसरा सवाल
रसगुल्ले बना लेती हो? 
मेरे परिवार को जोड़कर रखो तो? 
लड़की ने हाँ में सिर हिलाया 
आ रही थी दारू की बदबू
पूछा कि दारू की...? 
वह बोलता कि ननद ने कहा 
गंवार हो, फ्रैंच डियोडेंट लगा
होने लगी नगदी जेवर की बातें 
पांच लाख नगद, मोटरसाइकिल 
लड़की ने किया मना माता-पिता को
सभी ने इसे रिवाज का नाम दे डाला
पुराने खेत का टुकड़ा बिका
तब जाकर अच्छा विवाह हुआ.. 
ससुराल पहुंचकर हो रही थीं बातें
रिश्तेदार बोले कम मिला दहेज़, 
नाती होने पर, मांग लेना पच
धरो धैर्य! बहू को दबाकर रखो
मुंह दिखौनी की रस्म पूरी करो
कभी छोटी, कभी मोटी, 
कभी काली, कभी विकलांग, 
कभी बेरोजगार, कभी अनपढ़, 
कभी जाहिल, कभी कुरूप 
मुंह दिखौनी में दूर से आतीं
यह अपमानित जहरीलीं बातें 
आवाज़ों को सोखकर,रही खामोश! 
रात्रि शराब में तर पति का सवाल
मुझसे पहले कोई दूसरा तो नहीं? 
लड़की बोली 'आप प्रथम प्रेम' 
दो बातों से पहले वह जमीन पर गिरा
मिला शराबी पति, देख मन रो पड़ा
हे! विडम्बना तू कर ले आत्महत्या 
मेहंदी के हाथों ने स्व: को धुला
भारी लंहगा, भारी उपदेशों का बोझ
उतार, सादा साड़ी में गुमसुम बैठी रही
सारे सपने सारी उम्मीदें अश्रुरूप.... 
रातभर गश्त खा खाकर गिरतीं रहीं
सुबह हुई नाश्ता, फिर शौचालय सफाई 
तमाम उपाय किये, न छूटी नशे की लत
अमीरों के घर में पी जाती शराब
तुम भी पियो भूल जाओ अपना गांव
शहर की मॉडर्न लाईफ जियो 
यह सुनकर सोचती दुमँही इनकी सोच! 
न  जिंदगी में कभी रविवार आया 
न जिंदगी ने असली प्रेम जाना
लग गयी इस बीच सरकारी नौकरी 
छिड़ गयी ट्रांसफर सैलरी में जंग
मायके पैसे मत देना, 'मैं' की ठनी
सैलरी शकरूपी जंग में छूटा मायका
फिर नाती न होकर नातिन हुई
पूरे परिवार में पच की इच्छा पची
सभी का रोष हो गया था दूना
गर्भावस्था से लेकर पैदा तक
न दर्द पूछा न आह जानी
बस फोन पर क्या पैदा हुआ? 
ससुर ने बहू का जब पक्ष लिया 
सास ससुर का झगड़ा बढ़ा
सास बोलीं तुम अपना शुगर देखो
ज्यादा मीठा तोलमोल के बोलो
चुपचाप बहू लाती थी मिठाई 
कभी शुगरफ्री रबड़ी, रसमलाई 
जहां ससुर बिटिया बिटिया कहें, उधर
पति की दारू की दुर्गंध सी धूमिल 
नित्य अतृप्त वासना को झेलकर 
खुमारी दबा, सुबह चार बजे जागना
सफाई आदि, भोजन बनाती रही
शाम थकी आकर न पूछा हाल
पूछा तो बस शाम को क्या बनेगा? 
जैसे जीवन से निचोड़ 
लिया गया हो बूंद- बूंद जीवन
भोजनालय से शौचालय तक
बस जिंदगी से जूझती रही
वो परिवार की नाव को बनाती, 
खेवती, उबारती, नींव से 
सामंजस्य बैठाती रही
वह स्व: की नींव से घिसती, 
घुलती, रिसती रही, रिसती रही 
खुद के रिसाव से खुद को सीती रही
अतत:, रिसाव के धागे भी पड़े कम
बढ़ गया था इतना ज्यादा जख्म़ 
वो जर्जर जिस़्म जमीन पर पड़ा
फिर कर दिया गया अग्नि को अर्पण 
ससुर फूट कर रो भी न सके... 
देवर बोला इनकी नौकरी मुझे मिले? 
बातें आसपास भोजन की होने लगीं
तेहरवीं कब है? अकेले मर्द का क्या? 
भोजन के लिए दूसरा व्याह जरूरी है? 
हे! विडम्बना तू कर ले आज आत्महत्या 
भोजन के नाम पर प्रथम 'प्रेम' नदारद 


                                        आकांक्षा सक्सेना 


।। मुहब्बत ।।




माना कि' वक़्त ने, हमारे रास्ते; अलग कर दीए।
हमारे तकदीर ने, हमें क़दम क़दम पे धोखे दीए।
कहीं ख़्वाबों में, हम फिर कभी; टकरा ना जाए।

सच कहूं; मैं तेरी यादों सो भी किनारा करता हूं।
क्यों जो, तेरी आंखो में आंसू देखने से डरता हूं।
मैं दिल से, आज भी; तुझसे; मुहब्बत करता हूं।

बस इसी डर से डरकर, तेरे ख़त भी जला दिए।
पर, तेरे ख़तों की यादों में; मैंने दिए; जला दिए।
डरता था कहीं' दियों की लौ मद्धम हो ना जाए।

सो आजकल मैं' तेरी यादों में, लिखता रहता हूं।
क़लम के सहारे, रोज़ तारे; गिनना सीख रहा हूं।
आए दिन, अपनी मुहब्बत पे' गीत लिख रहा हूं।


                                       अमनदीप सिंह रखड़ा


मैं शब्दों को पिरोता हूँ




जी हुजूर मैं शब्दों को पिरोकर 
कुछ पंक्तियाँ लिखता हूँ ।    
उनके बारे में लिखता हूँ, 
जो धर्म को अपना हथियार बनाकर, 
समाज की नुमाइश करते हैं।। 

मैं उनके कारनामों को लिखता हूँ, 
जो भेदभाव के नाम पर समाज में ईष्या फैलाते। 
उनकी असलियत बताता हूँ, 
जो चोरी करके रपट लिखवाते हैं।। 

मैं भ्रष्टाचारियों के खेल का पर्दाफाश करता हूँ , 
जो जनता के हिस्से का खाकर डकार तक नहीं लेते। 
उन चुगलखोरों की आँखें खोलता हूँ  , 
जो चुगली करके दूध के धुले बन जाते  । 

जी जरूर मैं शब्दों को चुनकर  , 
कुछ अल्फ़ाज़ लिखता हूँ । 

सफेद कुर्ताधारी में छिपे, 
काले कुर्ते के कारनामे लिखता हूँ। 
उन फिजूल बातूनी बाजीगरों  की, 
पोल खोलता हूँ। 
जो जनता को अपनी रसीली बातों में बहकाता है । 

समाज में फैली कुरीतियों का जनाजा निकालता हूँ, 
अन्धविश्वास को मिटाने की कोशिश करता हूँ। 

जी हुजूर मैं शब्दों को पिरोकर , 
कुछ पंक्तियाँ लिखता हूँ 
अपनी व्यथा आप तक, 
और आपकी समाज तक पहुँचाता हूँ। 
जी जरूर मैं कुछ अल्फाजो ंको पिरोता हूँ।। 


                                              कैलाश उप्रेती "कोमल"