साहित्य चक्र

08 February 2023

व्यंग्यः चुगली रस

वर्तमान युग की भागम भाग और संघर्षों से भरी ज़िन्दगी में जहां लोगों के पास अपनों की तो छोड़िए,अपने लिए ही समय नहीं है।फुरसत के चंद लम्हें क्या होते हैं,इसको परिभाषित करना आज शायद ही किसी को आता हो।आज हर कोई दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है, कम समय में अधिक पाना चाहता है और जीवन में एक नया मुकाम हासिल करना चाहता है ।तो ज़ाहिर सी बात है इस सब के लिए व्यक्ति को अपने दिन रात एक करके मेहनत भी करनी पड़ती है।





इतनी व्यस्तताओं के बावजूद भी एक काम के लिए अधिकतर लोगों के पास भरपूर समय निकल आता है या यूं कहें कि वे उस पावन कार्य को अंजाम देने के लिए कैसे न कैसे वक्त निकाल ही लेते हैं।

वो पावन पुनीत कार्य कुछ और नहीं अपितु चुगली करना ही है।रस से भरपूर इस काम को लोग बड़े ही चाव से आगे बढ़ बढ़ कर करते हैं।यहां तक कि जिनका इस महान कार्य से दूर दराज तक कुछ लेना देना नहीं होता,वे भी बड़ी शिद्दत और लगन के साथ इस कार्य में दूसरों का पूर्ण सहयोग करते हैं और मदद कर मिलने वाले पुण्य के भागीदार बनने का परम सुख भोगते हैं।

बात घर की हो,बाहर की हो या ऑफिस की..चुगली करने वाले कर्मठ कार्यकर्ता आपको हर जगह बिना ढूंढे ही मिल जाएंगे।आपको उन्हें ढूंढने में जरा भी मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी।गली मोहल्ले में सास बहू की और उसके मायके वालों की, पार्क में बहू सास ननदों की और जेठानी देवरानियों की चुगली करते नहीं थकती।यही नहीं,साथ ही घंटों चुगलियां और बुराइयां करने के बाद उनका ये डायलॉग कि..अपनी तो आदत ही नहीं कभी किसी के बारे में कुछ इधर उधर का बोलने की...चुगली प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा जान पड़ता है क्योंकि तड़का तो ऐसे डायलॉग ही लगाते हैं न बातों में...अरे नही नहीं, माफ़ कीजियेगा ..चुगलियों में।

ऑफिस में सहकर्मियों की चुगली करना प्रत्येक सत्यनिष्ठ और कर्त्तव्यनिष्ठ कर्मचारी का जन्मसिद्ध अधिकार है,मानों अपॉइंटमेंट लेटर में यह भी लिखा हो कि जॉब मिलने के बाद यदि चुगली कार्यों से उदासीनता दिखाई तो इंक्रीमेंट नहीं मिलेगी या फिर मिलने वाले बोनस में कटौती की जाएगी।कौन सा कर्मचारी कितने बजे ऑफिस आया कितने बजे बाहर गया,किसका किससे चक्कर चल रहा है,कौन बॉस के पीठ पीछे उसे खडूस बोलता है,कौन प्रमोशन पाने के लिए चमचागिरी करता है ..इन सबकी जानकारी देने वाले महानुभाव चुगलखोरी में मास्टर्स की डिग्री लेकर ही ऑफिस ज्वाइन करते हैं।

राजनीति को ही देख लीजिए...नेताओं के चमचे, कडच्छे सब चुगली रस का भरपूर आनंद उठाते हैं।सफलता की सीढ़ी पर शीघ्रता से चढ़ने की लालसा लिए ये चमचे चुगली करने में भी राजनीति करते हैं।आज जिस पार्टी में हैं उनके सामने विपक्ष को ऐसे शब्दों में पेश करेंगे जैसे उनसे बड़ा पार्टी का शुभचिंतक दूसरा कोई नहीं।पार्टी बदलते ही उनकी चुगली का स्टाइल और शिकार दोनों बदल जाते हैं।उनके राजनैतिक जीवन में ऐसे असंख्य मौके आते हैं जब वे चुगलियों के माध्यम से अपने आला नेताओं की आंख का तारा बनना चाहते हैं और कामयाबी भी हासिल कर जाते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि आज के समय में ऐसा कोई महकमा,कोई संस्थान,कोई क्षेत्र शेष नहीं जो चुगलियों और चुगलखोरों से खुद को बचा हुआ पाता हो।क्या वाकई में चुगली करने में इतना रस मिलता है।


                                                    - पिंकी सिंघल


कविताः हसीन चेहरा



वो चेहरों में एक हसीन चेहरे को  तरासती रही,
चेहरे तो बहुत देखें पर आपसा  दिल नही दिखा।

अपने आशियाने में तुम्हें बसा कर रख लिया,
बेफिक्र होकर जीने का मकसद बना लिया।

कल भी मोहब्बत हमारी तुमसे थी आज भी‌ रही,
थोड़ी सी दूरियां हो गई पर एहसास आज भी।

आंखों को बंद कर सपनों में बातें किया करते,
हालचाल सब पूछ लेते हैं पर बस देखते नहीं।

मरजिया हमारी चलतीं रहीं तुम मुस्कुराते रहें,
गोदी में सिर रखकर हम तुम्हें गीत सुनाते रहे।

बड़ी कशिश वो तुम्हारी आंखों में हम निहारते रहे,
फलक जमी पर नही टिकते जैसे बाहों में आ गये।

गुस्ताखियां हमसे हो जाती तो माफ जल्दी कर देते,
बहुत सी अदा थी तुममें वो आज तक नहीं दिखी।


                                        - रामदेवी करौठिया 


स्मृति लेखः वे दिन भी क्या थे


मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब गर्मी की छुट्टियों में मुंबई से मेरे बड़े ताऊ जी - ताई जी, पापा, भैया - भाभी महानगरी ट्रेन से गाँव आते थे। घर के सभी लोग बहुत ख़ुश होते थे। कि मई माह तक सभी लोग साथ में रहेंगे। 1990 तक मेरे घर का पिछला हिस्सा मिट्टी और खपरैल से, आगे का ओसारा ईंट-सीमेंट से बना हुआ सुंदर लग रहा था। 




उत्तर मुखी घर का दिशा होने के कारण घर की बायीं तरफ़ एक नीम का पेड़ था। नीम के पेड़ के नीचे छोटा चबूतरा था जिस पर सुबह-शाम लोग बैठकर चाय पीते थे। पास में ही बहुत सुंदर पक्का बैठिका, उससे लगा हुआ आम का बग़ीचा जो बैठिका के पीछे तक फैला हुआ था। 

घर और बैठिका के सामने ख़ूब बड़ा-सा द्वार, घर के दाहिने ठंडी के मौसम में गाय, भैंस, बैल को रहने के लिए मिट्टी, लकड़ी, खपरैल से बना हुआ घर था। ठीक उसी के सामने बड़ी-सी चरनी थी जिसमें बड़े-बड़े हौदे थे। 

द्वार के बीचों - बीच विशाल पीपल का पेड़, उस पेड़ के नीचे गोलाकार में बड़ा-सा चबूतरा, और उस पर सुंदर शिव मंदिर है। इस मंदिर की पूजा मेरे दादाजी से लेकर आज तक घर के सभी सदस्य करते हैं। पीपल के चबूतरे की दस क़दम दूरी पर पुराना कुआँ था, जो १९९१ के आसपास सूख गया था, मेरे दूसरे नंबर के ताऊ जी ने सभी भाइयों एवं भतीजे के सहयोग से उस कुएँ का पुनर्निर्माण करवाया था। उस समय हम सभी लोगों ने पानी के महत्त्व को भली-भाँति जाना। 


बात तो मैं कर रही थी गर्मी की छुट्टियों की, यह मन भी कहाँ-कहाँ चला जाता है। दोपहर के समय हम सभी आम के बग़ीचे में जाते थे, पेड़ों के नीचे ख़ूब खेलते थे। मुझे आज भी वे खेल याद हैं जैसे; कबड्डी, सिल्लो पत्ती, चिब्भी, कौड़िया बुझावल जिसकी पंक्ति आज भी मुझे याद है—सुमन पारी धीरे से आना शोर न मचाना, पीछे मुड़के ताली बजाना; यह खेल मुझे बहुत पसंद था। 

उसी आम के बग़ीचे में बड़े-बड़े पलंग बिछे रहते थे, तो कुछ पलंग पीपल के पेड़ के नीचे। सब अपने उम्र वालों के साथ हँसी ठहाका लगाते थे, लू चलती थी, फिर भी हमें कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता था। जहाँ धूप आती थी, वहाँ से चारपाई खिसका कर छाँव में कर लेते थे। 

जब किसी को प्यास लगती थी तो घर का कोई बड़ा व्यक्ति कुएँ से पीतल के गगरा में पानी निकाल लाता था, तो घर की बेटी बड़ी माई से मूँज की बनी डलिया में गुड़ माँग लाती थी। 

सबकी खाने की रुचि अलग-अलग थी, कोई कच्चा आम नमक के साथ, तो कोई सत्तू, कोई लाई चना खाता, तो कोई आम भूनकर पन्ना बना लाता, तो कोई बेल शरबत क्या! सब में प्यार था। 

धीरे - धीरे छुट्टियाँ समाप्त होने लगतीं थी, तो परदेसियों के बैग को घर की महिलाएँ भरना शुरू कर देती थीं जैसे; आम, कटहल का अचार, अरहर की दाल, अलसी का लड्डू, भुना चना, सत्तू आदि। एक महीना हँसी-ख़ुशी कैसे बीत जाता था समय का पता ही नहीं चलता था। मुंबई में 13 जून से स्कूल खुल जाते हैं।

आज भी! मुझे वे दिन याद हैं। जब मेरे पापा, ताई-ताऊजी, भैया-भाभी मुंबई जाते थे तो घर के सदस्यों में से बहुएँ, मँझली अम्मा, मम्मी को छोड़कर सभी लोग सड़क तक बैग, अटैची, बॉक्स लेकर जाते थे और बस का इंतज़ार करते थे, कितना प्रेम था! बीस मिनट आधे घंटे बाद रोडवेज़ बस भी आ जाती थी,  तो इतने में पापा , बड़े पापा, भाभी - भैया अपने से बड़ों का चरण स्पर्श करते थें तो हम सभी छोटे बच्चे भी उनका चरण स्पर्श करते थे | हम लोगों को चॉकलेट खाने का पैसा  मिलता था। 

हमारे घर से डेढ़ घंटे का सफ़र था, इसलिए मेरे घर के लोग बनारस ही उतरते थे और बनारस से ही मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ते थे। परदेसियों का जाने से एक ओर मन दुखी रहता था तो दूसरी ओर हम भाई-बहन एक दूसरे से पूछते थे- तुमको पापा ने कितना पैसा दिया, हमको ताई जी ने इतना दिया। हम लोग हाथ में पैसे लिए सीधे गाँव की छोटी दुकान पर चले जाते थे। हम सब भाई-बहन अपनी पसंद का चॉकलेट लेते थे, एक दूसरे को खिलाते थे और उनका भी खाते थे, आपस में बात करते हुए घर आते थे और हम सभी को इंतज़ार रहता था गर्मी की छुट्टियों का। 


आज भी! वे दिन याद है मुझे! 
हमेशा याद रहेंगे, 
जो ख़ुशी के पल बिताए हैं हम अपनों के साथ, 
चेतना ने जिया है उन पलों को 
आज के युग में
धनी व्यक्ति वही है जिसके पास परिवार है, 
माता-पिता का आशीर्वाद साथ है, 
भाई का प्यार है, बहन का दुलार, 
ज़िन्दगी ना मिलेगी फिर दोबारा, 


मैं जब भी किसी को याद करती हूँ, तो उसकी अच्छाइयों के साथ और उसे याद करके कुछ पल के लिए मैं अतीत में खो जाती हूँ। मन ही मन कह उठती हूँ, “वे भी क्या दिन थे! वे दिन भी क्या थे!”


                                                  - चेतना प्रकाश चितेरी



हे युवाओं




हे युवाओ, अब तुम सब आगे बढो,
रूकने का अब,नाम भी मत लो।

उठी सब जागो, आगे बढो,
लक्ष्य अपना हासिल कर लो।

अब बैठने का नही रहा वक्त, 
हो जाओ तुम सब अब,तैयार।

होना पड़ेगा अब तमसबो को सख्त,
लेना होगा अपना अधिकार ।

ये दुनिया है बहुत ही स्वार्थी, 
कर्म पथ के तुम सब हो अभ्यर्थी,।

अनुनय विनय का नही है समय,
कर्म करने से मत कर,संषय।

तुमसब निडर बनो और साहसी,
नही हो कायर,लक्षय को रहे अभिलाषी।

लक्ष्य हासिल करने के प्रति, 
सब लगाये अपना शक्ति ।

तुमसबो को यहाँ कर्म किये  बिना,
कठिन होगा कुछ भी हासिल करना।

तुमसब रूककर अब न करो वक्त बेकार,
उठो, जागो आगे बढीं, ले निज अधिकार ।

युवा हो तुमसब हमारे इस वक्त का,
बहाव प्रवाल है तन मे तेरे रख का।

फिर किसी भी कार्य से क्यों डरना,
कर्मे कर लक्ष्य है तुमसबो को हासिल करना।

कहते है चुन्नू कवि समस्त युवा ओ से,
पीछे कभी मत मुडना भविष्य के संभावनाओं से।

हे युवाओं अब तुम सब हो एकत्रित, 
एकता का ताकत ही है हमारा संगठित।


                                            - चुन्नू साहा


लघुकथाः उपकार

रमाशंकर की कार जैसे हो सोसायटी के गेट में घुसी, गार्ड ने उन्हें रोक कर कहा, "साहब, यह महाशय आपके नाम और पते की चिट्ठी ले कर न जाने कब से भटक रहे हैं।"




रमाशंकर ने चिट्ठी ले कर देखा, नाम और पता तो उन्हीं का था, पर जब उन्होंने चिट्ठी लाने वाले की ओर देखा तो उसे पहचान नहीं पाए। चिट्ठी एक बहुत थके से बुजुर्ग ले कर आए थे। उनके साथ बीमार सा एक लड़का भी था। उन्हें देख कर रमाशंकर को तरस आ गया। शायद बहुत देर से वे घर तलाश रहे थे। उन्हें अपने घर ला कर कहा, "पहले तो आप बैठ जाइए।" इसके बाद नंकर को आवाज लगाई, "रामू इन्हें पानी ला कर दो।" 

पानी पी कर बुजुर्ग ने थोड़ी राहत महसूस की तो रमाशंकर ने पूछा, "अब बताइए किससे मिलना है?"

"तुम्हारे बाबा देवकुमार जी ने भेजा है। बहुत दयालु हैं वह। मेरे इस बच्चे की हालत बहुत खराब है। गांव में इलाज नहीं हो पा रहा था। किसी सरकारी अस्पताल में इसे भर्ती करवा दो बेटा, जान बच जाए इसकी। एकलौता बच्चा है।" इतना कहते कहते बुजुर्ग का गला रुंध गया।

रमाशंकर ने उन्हें गेस्टरूम में ठहराया। पत्नी से कह कर खाने का इंतजाम कराया। अगले दिन फैमिली डाक्टर को बुलाकर सारी जांच करवा कर इलाज शुरू करवा दिया। बुजुर्ग कहते रहे कि किसी सरकारी अस्पताल में करवा कर दो, पर रमाशंकर ने उसकी एक नहीं सुनी। बच्चे का पूरा इलाज अच्छी तरह करवा दिया।

बच्चे के ठीक होने पर बुजुर्ग गांव जाने लगे तो रमाशंकर को तमाम दुआएं दीं। रमाशंकर ने दिलासा देते हुए एक चिट्ठी दे कर कहा, "इसे पिताजी को दे दीजिएगा।"

गांव पहुंच कर देवकुमारजी को वह चिठ्ठी दे कर बुजुर्ग बहुत तारीफ करने लगा, " आप का बेटा तो देवता है। कितना ध्यान रखा हमारा। अपने घर में रख कर इलाज करवाया।"

देवकुमार चिटठी पढ़ कर दंग रह गए। उसमें लिखा था, "अब आप का बेटा इस पते पर नहीं रहता। कुछ समय पहले ही मैं यहां रहने आया हूं। पर मुझे भी आप अपना ही बेटा समझें। इनसे कुछ मत कहिएगा। आपकी वजह से मुझे इन अतिथि देवता से जितना आशीर्वाद और दुआएं मिली हैं, उस उपकार के लिए मैं आपका सदैव आभारी रहूंगा।-आपका रमाशंकर।"
देवकुमार सोचने लगे, आज भी दुनिया में इस तरह के लोग हैं क्या ?


                                       - वीरेंद्र बहादुर सिंह